Last modified on 22 जून 2019, at 14:11

स्त्री विमर्श / विवेक चतुर्वेदी

सशुल्क योगदानकर्ता ५ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 14:11, 22 जून 2019 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=विवेक चतुर्वेदी |अनुवादक= |संग्रह...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

मंच पर आभासी था
स्त्री विमर्श
वो वास्तविक था नेपथ्य में

विद्रूप हँसी की डोर से
खींचे जा रहे
लिप्सा और जुगुप्सा के
पर्दों के बीच
अतृप्त वासनाओं से
धूसर ग्रीन रूम के
उस विमर्श में थे
स्त्री के स्तन ही स्तन
फूले और माँसल
ओंठ थे,जाँघे थीं,नितम्ब थे
न था मस्तिष्क, न ह्रदय
न कविता लिखने को हाथ
न कंचनजंघा पर
चढने को पैर

वहाँ अदीब थे,आला हुक्मरान...थिंकर...
यूनिवर्सिटी के उस्ताद थे
पर सब थे बदजबान लौंडे
नंगे होने की उनमें गजब की होड़ थी
शराब में घोला जा
रहा था भीतर का कलुष
गर्म धुँए में तानी जा रही थी
स्त्री की देह...
वहाँ चर्चा बहुत वैश्विक थी
बड़ा था उसका फलक
उसमें खींची जा रही थी स्त्री
पहली और तीसरी दुनिया के देशों से
न्यूयॉर्क और पेरिस
नेपाल और भूटान
इजराइल और जापान
  
उस रात विमर्श में
स्त्री बस नग्न लेटी रही
न उसने धान कूटा
न पिलाया बच्चे को दूध
न वो ट्राम पकड़ने दौड़ी
न उसने हिलाया परखनली को
न सेंकी रोटी

रात तीसरे पहर उन सबने
अलगनी पर टँगे
अपने मुखौटे पहने
और चल दिए
वहाँ छूट गई
स्त्री सुबह तक
अपनी इयत्ता ढूँढती रही।।