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हम फकीरों की गली में झांकिए / रवीन्द्र प्रभात

हम फकीरों की गली में झांकिए !
सच-बयानी को बुरा मत मानिए !!


फक्र है खुद की जवानी पर यदि -
तो बुढापे का भरम भी जानिए !!


जर्फ़ हो तो सर झुकाने की जगह -
सर झुके जितना झुकाना चाहिए !!


सुर्ख़ियों में आज तो मदहोश हो -
होश आएंगे मिलेंगे जब हाशिये !!


आपकी हर बात अच्छी है मियाँ -
पर मेरे कश्मीर को मत मांगिए !!


बक्त कहता है यही अब ऐ "प्रभात"
आस्तीं में सांप मत अब पालिए !!