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अँधियारे एकान्त में / अनुभूति गुप्ता

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अँधियारे एकान्त में
सुनसान चैराहे के
बीचों-बीच
खड़ा आदमी
मद्धिम चाँदनी को
विलुब्ध नेत्रों से देखता है

घड़ी के काँटों की
टिक-टिक
रह-रहकर उसे सताती है,
डराती है, बरगलाती है, धमकाती है
और
एकाएक बोल पड़ती है

कि:
तुम्हें तो
वक्त ने भी
अपना मित्र बनाने से
निषिद्ध कर दिया है
तुम उसके हाथों की
महज कठपुतली हो
दुःख की आँधी में
तुम तो
एक बार में ही सहम जाओगे
थर-थर काँपोगे
आँखें मूंदकर
मन ही मन यह मनाओगे
कि-
काश
यह सिर्फ़
एक बुरा सपना ही हो।