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अंगिका रामायण / चौथा सर्ग / भाग 1 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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बार-बार वन्दौं हम शंकर महादेव के
राम जी के कथा जे प्रथम बेर गैलका।
करै छी वन्दना भुसुण्डी जी महाराज के रोॅ
काग के शरीर मंे जे रामकथा पैलका।
वन्दना करै छी फेरो ऋषि याज्ञवलक के
जौने रामकथा भरद्वाज के सुनैलका।
फेरो वन्दना करै छी प्रेम से गोस्वामी जी के
जौने राम कथा घरे-घर पहुँचैलका॥1॥

बेर-बेर वंदौ ब्रह्म रूप चारो वेद के रोॅ
धरम सनातन के जौने कि आधार छै।
सुमिरन करै छी अठारहो पुराण के रोॅ
धरम के नाव के रोॅ जौने पतवार छै।
फेरो वन्दना करै छी नित छहो शास्त्र के रोॅ
जिनकर जोत से ई जग उजियार छै।
भनत विजेता सदग्रंथ के शरण गहोॅ
ज्ञान अेॅ भगति बिन जिन्दगी बेकार छै॥2॥

विष्णु के चरण से जेना कि गंगा निकलल
ज्ञान गंगा बहै ओन्हें गुरु के चरण से।
ब्रह्मा के कमण्डल में जैसे गंगा बास करै
वैसें ज्ञान बास करै गुरु के शरण में।
शिव के जटा से गंगा धरती पे आवै जेना
तैसें उतरै छै ज्ञान शिष्य के जीवन में।
गुरु ब्रह्मा, विष्णु गुरु, गुरु छै महेश जकाँ
गुरु से बड़ा न कोनो छै तीनों भुवन में॥3॥

बार-बार वंदौ सब संत के चरण रज
परहित हेतु जिनकर तन प्राण छै।
जगत के हित लेली अपनोॅ अहित करै
महामति संत ऋषि शृंगी जे परमान छै।
काम नाहि, क्रोध नाहि, लोभ नाहि, मोह नाहि
तिल भर मद-मतसर के न भान छै।
ब्रह्म रूपी आगिन में खुद के आहुत करै-
जौने संत, तौने भगवंत के समान छै॥4॥

दोसरा के दुख से जे दुखित हुए छै आरू
दोसरा के सुख से सुखित बनि जाय छै।
अपनोॅ न लाभ हानी कखनों बिचार करै
हरदम जगत के मंगल मनाय छै।
मन में न कभी तिल भर अभिमान आनै
एहन स्वभाव से सहज बनि जाय छै।
भनत विजेता एन्हों संत कें नमन जौने
मान अपमान से उपर उठि जाय छै॥5॥

सोरठा -

संत चरण धरि शीश, हम गावौ रघुपति चरित।
पूर्ण करोॅ जगदीश, हय रामायण अंगिका॥1॥

पछलकि पारवती एक बात कहु नाथ
धरती बेचारी कियेॅ धेनु रूप धैलकै?
व्यथित वसुन्धरा के विनित वचन सुनि
कोने उतजोग तब देव सिनी कैलकै?
देवता सभे के विसमय में परल बूझि
कौने देवता सिनी के रसता बतैलकै?
कोन विधि मिटल विषाद सब देव के रोॅ
कोन विधि मानव के तन हरि धैलकै?॥6॥

बोलल महेश सुनोॅ गिरिवर नन्दनी हे
जब आसुरी चरित्र सगरो पसरलै।
जोग अेॅ विराग गेल, सब तप त्याग गेल
अनाचार सब के चरित्र में उतरलै।
पर धन, पर नारी बाहुवली हरलक
भगत पुजारी के रोॅ धरम बिगरलै।
चोर अेॅ जुआरी, कहीं दारू कहीं तारी आदि
जन व्यभिचारी घड़ा पाप केरोॅ भरलै॥7॥

जानी लेॅ भवानी जब धरम के हानी भेल
माता-पिता गुरु के खवास जकाँ बुझलै।
मानुष चरित्र लखि धरती व्यथित भेली
तब उनका उपाय कुछ भी न सुझलै।
पर के रोॅ नारी आरो पर धन हारी लोग
बड़ अपकारी से ई वसुन्धरा जुझलै।
मानव के काज से पीड़ित भेली धरती तेॅ।
कोन काज करोॅ कुछ जुगति न सुझलै॥8॥

धरती धेनु के रूप धरि ऐली देव पास
आवी देव के समक्ष हँकरी केॅ कानलै।
आसुरि प्रवृति से त देवतो पिड़ित रहै
धरती केॅ दुख सुनि सब दुख मानलै।
धरती समेत देव ऐला ब्रह्मदेव पास
जिनकर पीड़ा ब्रह्मदेव पहचानलै।
किनको न कोनो तब जुगति समझ आवै
ब्रह्मा असमर्थ जब अपना के जानलै॥9॥

देवगुरु बोलल कि सुनोॅ माता वसुन्धरा
हरि के सुमरि लेॅ सकल दुख हरतोॅ।
हमरो-तोहरो सब के रोॅ हितकारी हरि
कठिन विपत से उवार तोरोॅ करतोॅ।
वैकुण्ठ में या तेॅ क्षीर सिन्धु में मिलत हरि
उनके चरण गहि सब दुख टरतोॅ।
देवगुरु के रोॅ ध्यान परल जगत गुरु
शिव सुमिरन करोॅ जुगति मंजरतोॅ॥10॥

दोहा -

देवराज सँग देवगण, धरलक शिव के ध्यान।
महादेव से माँगलन, सब मिलि नेक निदान॥1॥