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अंगिका रामायण / चौथा सर्ग / भाग 2 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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देवोॅ के पुकार सुनी शिवजी प्रकट भेला
आदिदेव गुरु जी के जुगती बतैलका।
कोने ऊ जगह छै जहाँ कि हरि के न वास
देवगुरु के जगत गुरु समझैलका।
जौने प्राणी जौने रूप हरि जी के ध्यान करै
तहाँ-तब-तौने रूप में हरि के पैलका।
हरि के भगति जिनकर चित में न बसै
मंदिर-मंदिर घुमि समय गमैलका॥11॥

जेना कि अरनि मथि आगिन प्रकट भेल
जेना कि विचार मथि निकलल ज्ञान छै।
जेना कि सागर मथि चौदह रतन आरू
आतम मंथन करि पावै निरवान छै।
जेना कि अरथ मथि पावै छै बनिक धन
स्वर मथि निकलल सुमधुर गान छै।
वैसी ना श्रद्धालु संत भगति के रस बोरी
प्रेम के मथि प्रकट करै भगवान छै॥12॥

धरती-आकाश-वायु-आगिन-अेॅ जल बीच
जगत के उद्भव कारण में राम छै।
निरगुन रहि सब गुन के भोगनिहार
जगत के कामना में राम निसकाम छै।
जेना कि सुरूज के रोॅ किरण में जल बसै
चर आरो अचर में तैसीं नाखि राम छै।
ज्ञानी के समीप अगियानी लेखें दूर बसै
अन्हरा हेरैत फिरै राम कोन ठाम छै॥13॥

हरि छै अजनमा अरूप अेॅ अनादि जौने
सप्त ऋषि आदि, सनकादि निरमैलकै।
लीलाधारी हरि कण-कण में व्यापित भेल
सब जीव में रमी क लीला बड़ी कैलकै।
हरि के स्वरूप-विस्तार के न अंत कहीं
अवसर पाय जे अनेक रूप धैलकै।
अदिति के पुत्र वहेॅ विष्णु भगवान भेल
जिनका कि देव जग पालक बतैलकै॥14॥

सत्-तम-रज तीनों गुण उपजावै वाला
परम आनन्द के रोॅ कारक भी हरि छै।
सत् आरो असत् से परे चिदानन्द स्वामी
अनन्त स्वरूप गुण धारक भी हरि छै।
जिनकोॅ अनन्त नैन, जिनकोॅ अनन्त मुख
आरो अति बाहु-पग धारक भी हरि छै।
जगत के कारक, सकल गुण धारक जे
जगत के तारक, संघारक भी हरि छै॥15॥

दोहा -

हरि व्यापित सर्वत्र छै, अलख-अरूप-अनाम।
अगुन-सगुन के मध्य छै, अग-जग रमता राम॥2॥

सूरज के तेज में भी, चन्द्रमा के तेज में भी
आगिन के तेज में भी हरि के रोॅ बास छै।
धरती आकाश में भी, जल में भी वायु में भी
मन बुद्धि आरो चित्त मंे हरि के बास छै।
ईश के स्वरूप गहि, चन्द्रमा के तेज बनि
अमिय सामान हरि औषध में वास छै।
जीवन के प्राण तत्व, भोज्य के पाचन तत्व
करता वेदान्त के रोॅ ज्ञान के प्रकाश छै॥16॥

रवि के तपावै वाला, वारिस के लावै वाला
वनस्पति के हरियावै वाला हरि छै।
यज्ञ में भी, मंत्र में भी, पूजन हवन में भी
वेद में परायण मंे गायन में हरि छै।
ध्वनित ओंकार में, साकार निराकार में भी
छहो शास्त्र सब टा पुराण में भी हरि छै।
नाम में भी हरि चारो धाम में भी हरि शुभ-
काम में भी हरि, आठो याम में भी हरि छै॥17॥

छन-घड़ी-पल-दिन-मास में भी हरि बसै
अग-जग-खग-मृग में हरि के बास छै।
जल में भी हरि, जल जीव में भी हरि बसै
नदी-नद-सरोवर में हरि के बास छै।
आदि में भी हरि अवसान मंे भी हरि बसै
ध्वंस निरमान में भी हरि के रोॅ बास छै।
सब टा नक्षत्र, छहो ऋतु में भी हरि बसै
रीत-प्रीत-हार-जीत में हरि के बास छै॥18॥

राजा के रोॅ निती बीच, ज्ञानी के रोॅ मौंन बीच
वीर के रोॅ पौरूष में बास करै हरि छै।
कथा के रोॅ वाचक में यज्ञ के पुरोहित में
मानस के मानस में बास करै हरि छै।
कवि के रोॅ लेखनी में चित्रक के तूलिका में
नर्तक के भंगिमा में सदा बसै हरि छै।
भाव में भी हरि बसै, छन्द मंे भी हरि बसै
गीत में संगीत में कवित्त में भी हरि छै॥19॥

उनचासो मरूत अेॅ आठो वसु में भी हरि
नवो ग्रह, बारहो राशि में बसै हरि छै।
जल-थल-गगन-पाताल में भी हरि बसै
व्यापित सगर सौर जगत में हरि छै।
भोजन के तत्व में भी, स्वाद में भी हरि बसै
आरो भोज्य के चारो प्रकार में भी हरि छै।
धरम-अरथ काम मोक्ष में भी हरि बसै
सब टा भगत के रोॅ मन बीच हरि छै॥20॥

दोहा -

हरि चरचा कहि-कहि थकै, पार न पावै संत
सकै न शारदा शेष भी, व्यापक ब्रह्म अनन्त॥3॥