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अंगिका रामायण / चौथा सर्ग / भाग 4 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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एक दिन दशरथ मन में विचारलन
अयोध्या के शोभा अमरावती समान छै।
अन-धन सब सुख सम्पदा भरल यहाँ
भाँति-भाँति बहुमूल्य रतन के खान छै।
भाट-नट-नायक-चारण अेॅ याचक गण
सब मिली करै निज देश के रोॅ गान छै।
सब कुछ रहते, केवल एक पुत्र बिना
जिन्दगी ही लागै जेना निपट विरान छै॥31॥

राजा दशरथ जी वशिष्ट जी के घर आवी
मन के रॉे व्यथा कुलगुरु के सुनैलका।
राजा के व्यथित तब देखी केॅ वशिष्ट देव
पुत्र हेतु यज्ञ ही निदान बतलैलका।
तब बामदेव आरू कश्यप जावाली आदि
सब के बोलावी केॅ विचार हुन्हीं कैलका।
फेरो राजा दशरथ मंगल विचारी तब
आवि केॅ अपन तीनो रानी के सुनैलका॥32॥

एकान्त विचारी तब एक टा पुराण कथा
सारथी सुमन्त दशरथ के सुनैलका।
पुराणोॅ में जौने कथा सनत कुमार ऋषि
नारद समेत सब ऋषि के सुनैलका।
अंग के नरेश बलशाली राजा रोमपाद
जिनकर यश सब देशे-देश गैलका।
जिनकर यश सुनि अवधनरेश तब
दोसंती के हाथ रोमपाद से मिलैलका॥33॥

सोरठा -

कहलन कथा सुमंत, शृंगी चरित सादर सुनोॅ।
श्रोता सब टा संत, वक्ता सनत कुमार ऋषि॥3॥

राजा दशरथ के बतल दिन याद भेल
केना रोमपाद से ऊ दोस्ती निमैलकै।
रानी कौशल्या से जब शान्ता के जनम भेल
केना केॅ ऊ रोमपाद घर पहुँचैलकै।
केना केॅ उछाह से भरल पूरे अंगदेश
केना केॅ सोहर पुरवासी सिनी गैलके।
केना अंग-अवध के दोस्ती अटूट भेल
एक-एक बात दशरथ याद कैलकै॥34॥

तब सारथी सुमन्त कथा विसतारलक
मनोरम मालिनी के हाल बतलैलकै।
एक दिन उरवसी जल क्रिड़ा करै छेलै
सब दिश मोहक विचार निरमैलकै।
तखने विमांडक जुमल सरवर पर
मोहक स्वरूप तब ऋषि के लुभैलकै।
तब ऋषि विभांडक काम के अधिन भेल
ऋषि, ‘मृगमदा’ के रोॅ आलिंगन कैलकै॥35॥

ऋषि विभांडक प्रिया ‘मृग-गोतरीय-कन्या’
‘मृगमदा’ एक शिशु के जनम देलकै।
शिशु के शिखर के रोॅ शृंग पे जनम भेल
इहेॅ लेलि विभांडक शृंगी नाम धैलकै।
शृंगी भेल जनम आखाढ़ के पूरनमासी
मिली वनवासी सिनी मंगल मनैलकै।
विभाण्डक शृंगी के रोॅ माता से अलग राखि
सब-टा करम काण्ड उनका सिखैलकै॥36॥

नारी के विलोकी जब खसल विभाण्डक तेॅ
कुटिया के नारी वरजित करि देलका।
अद्भुत तेज बल प्रतापी कुमार शृंगी
चरित्र धरम पिता प्रेम से पढ़ैलका।
सब से अलग रहि संयम नियम राखि
दोनो विधि ब्रह्मचर्य धरम निभैलका।
पिता से मिलल सब संयम अेॅ सदाचार
नारद जेकर यश घुमि-घुमि गैलका॥37॥

सवैया -

मालिनी के वन में ऋषि शृंगी’
करे जप जोग सुसंयम साधै।
भोग-रॅ जे उतजोग न जानय
जे परब्रह्म के नित्य अराधै।
जे चित रोपि रखै हरि में अरू
जोग सॅ जे कि दशो दिश बाँधै।
नारि रॅ जे कि स्वरूप न जानय
संत रॅ जे कि उपाधि उपाधै॥7॥

दोहा -

मुद्गल कात्यायण ऋषि, शृंगी-विभाण्डकहोल।
ज्ञानी अष्टावक्र सें, बढ़ल अंग के मोल॥6॥

सोरठा -

बढ़ल अंग के मोल, रोमपाद राजा जहाँ।
बड़ सुखमय माहौल, सब जनता हरखित दिखै॥4॥

राजा रोमपाद अंगदेश के नरेश छेलै
जिनकर यश-बल सब जग जानलै।
बल के प्रताप के बढ़ल यशगान जब
यश सुनि-सुनि तब राजमद जागलै।
राजमद बढ़तें ही अधर्म पनपि गेल
रसें-रसें प्रकृति बेरूख हुए लागलै।
प्रकृति बेरूख होतें अनावृष्टि बढ़ि गेल
साले-साल राज्य में अकाल पड़ेॅ लागलै॥38॥

राज्य के भयंकर आकाल से जुझैत देखि
राजा रोमपाद तब पंडित बोलैलकै।
प्रकृति प्रकोप से बचै के उतजोग पर
सब मिल गहन विचार तब कैलकै।
राज्य में धरम के विरूद्ध कोनो काज भेल
पंडित-पुरोहित विचारी केॅ सुनैलकै।
एकरे प्रकोप से ई प्रकृति बेरूख भेल
आरो तब एकरोॅ निदान बतलैलकै॥39॥

मालिनी के वन में बसल ऋषि विभांडक
उनकर पुत्र ऋषि शृंगी सुकुमार छै।
वेद अेॅ पुराण, छहो शास्त्र के रोॅ ज्ञाता जौने
जिनकर धरम पारायण आचार छै।
पाँच कोस जंगल छै नारी वरजित क्षेत्र
नारी आन-जान के न जहाँ सहचार छै।
जगत के रील से निपट अनजान ऋषि
जिनकर तप-वल अगम अपार छै॥40॥