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अंगिका रामायण / चौथा सर्ग / भाग 8 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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नगरवधु अेॅ शृंगी दोनों के रोॅ बातचीत
दोनों के रोॅ मन में आनन्द भरि देलकै।
विभांडक आवै के खबर से नगरवधु
बार-बार ध्यान में आवी केॅ बसै व्रात्य संत
जौने कि विचार के स्वछन्द करि देलकै।
चारो दिश कुटिया के चौकन्न निहारै ऋषि
आनन्द के सोत कौने बन्द करि देलकै॥71॥

कुटिया में ऐलोॅ छेलै कहोल ऋषि के शिष्य
ई प्रसंग शृंगी विभांडक के बतैलकै।
आवै के उद्देश्य कोनो खास न बूझि परल
एकरा से आगू आरो कुछ न बतैलकै।
दू दिनोॅ के बाद ऋषि फेरो वहीं निकलल
निजगुत लौटै के न समय बतैलकै।
इहेॅ बीच आवी गेल फेरो से नगरवधु
फेरो से उद्देश्य के रोॅ जुगती भिरैलकै॥72॥

हरिगीतिका -

नित फोल पावी अंशुमाल शृंगी से मिलतें रहल।
सम्बन्ध मेल प्रगाढ़ नित-नित नव कुसुम खिलतें रहल।
जब बढ़ल नेह अथाह शृंगी पथ निहारेॅ लागलै।
खुद शृंगी समझेॅ नै सकल है नेह कैसें जागलै॥1॥

जब अंशुमाला भंगिमा अपनोॅ दिखावेॅ लागलै।
तब अंशुमाला शृंगी के कुछ और भावेॅ लागलै।
तब समय के गति बाढ़लै, दिन पल बुझावें लागलै।
सम्बन्ध में भी एक अनबुझ भाव जागेॅ लागलै॥2॥

एक दिन आवी गेल सब-टा सहेली संग
कुटिया में आबी सब उधम मचैलकै।
सब मिली-जुली नाचै, हरि के चरित बाँचै
ईश के भजन सब आनन्द सें गैलकै।
सब के भगति देखि ऋषि आनन्दित भेल
धरम के अंग ऋषि सब के बतैलकै।
धरम के दू प्रकार श्रुत अेॅ चरित धर्म
दोनों पर शृंगी बिसतार से बतैलकै॥73॥

तपसी कुमार पर अपनोॅ प्रभाव बूझि
बात-चीत अपनोॅ उद्देश्य पर लैलकै।
पहिने तेॅ राजा रोमपाद के बखान करि
अंग के पुराण कथा उनका सुनैलकै।
फेरो अंग देश दिश आवै के रोॅ आमंत्रण
तपसी के सामने नगरवधु धैलकै।
दोसती के नेह डोर कसी केॅ बान्हल रहै
बरबस ऋषि शृंगी बात नै उठैलकै॥74॥

दोहा -

बंधल नेह के डोर से, तपसी शृंगी किशोर।
आमंत्रण गहि ‘अंशु’ के, चलल अंग के ओर॥12॥

सब-टा सहेली मिली तपसी कुमार के रोॅ
चारो दिश से घेरी केॅ घाट तक लैलकै।
दोनो दिश प्रेम से पकड़ि केॅ नगरवधु
चाँच के सहारे तब नाव पे चढ़ैलकै।
नंगड़ उठावी माँझी माँगी के प्रमाण करि
अंजुरी में जल लेॅ केॅ अरग चढ़ैलकै।
सब के चढ़ावी माँझी, अपनों चहरि गेल
पूरब के दिश नाव आपनोॅ बढ़ैलकै॥75॥

नाव खुलते तुरंत पछिया सिहरि गेल
धार दिश नाव रफ्तार धरि लेलकै।
पथ में मिलल मुद्गल ऋषि के रोॅ कुटि
सब मिली उनका प्रणाम करि लेलकै।
फेरो अजगव महादेव के प्रणाम करि
हवा रूखें पाल के कनारी फेरी लेलकै।
चित्त परसन्न भेल चौपाई नगर आबि
घाट पे उतारि सब नंगर धरलकै॥76॥

राजा रोमपाद ऋषि शृंगी के रोॅ स्वागत में
सुन्दर तोरन द्वार रचि बनवैलकै।
घर से किनार तक बान्हल बन्दनवार
मारग में भाँति-भाँति फुल बिछवैलकै।
ऋषि के आनै के लेली पालकी पहुँची गेल
आदर से पालकी पे उनका बिठैलकै।
स्वागत में लीन एक बात के रोॅ चूक भेल
धरती पे गोर ऋषि अपनोॅ न धैलकै॥77॥

पुरवासी यहाँ-वहाँ सगरो कतारबद्ध
जय-जयकार ऋषि शृंगी के मचैलकै।
सब करबद्ध निज अंजुरि में फूल लेने
पालकी ऊपर सब फूल बरसैलकै।
शृंगी के रोॅ स्वागत में पुर के रोॅ नर-नारी
नगर में परम उछाह ऊ मनैलकै।
राजा रोमपाद तब यज्ञ यजमान बनि
यज्ञ हेतु पूजन के साधन जुटैलकै॥78॥

पालकी के नीचे पाँव धरलक शृंगी ऋषि
चरण परसि तब धरती हरसलै।
शृंगी आगमन से ही वरूण प्रसन्न भेल
उमड़ि-घुमड़ि मेघ बहुत बरसलै।
यज्ञ के रोॅ तब शुभ-शुभ शुभारम्भ भेल
मेघ के रोॅ बुन्द पाय धरती सरसलै।
रसें-रसें हरियाली सगरो पसरि गेल
पेर-पौध-फूल-पात सब-टा बिहँसलै॥79॥

सोरठा -

बदलल सब-टा रंग, गांव-नगर-वन-वाग सब।
हरसल जनपद अंग, सुनि शृंगी के आगमन॥6॥

यज्ञ पुरोहित द्वारा आवाहन भेल जब
सब देव आवी केॅ अपन भाग लेलकै।
आवाहन सुनि अग्निदेव प्रज्वलित भेल
यजमान तब अग्नि के आहुति देलकै।
यज्ञ के प्रभाव से दसो दिस प्रसन्न भेल
आनन्दित-आनन्दित मन करि देलकै।
चारो दिश गूँजल शृंगी के जयकार तब
जौने अंग के रोॅ दुरभिक्ष हरि लेलकै॥80॥