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अंगिका रामायण / चौथा सर्ग / भाग 9 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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यज्ञ भेल पूरन, मौसम अनुकूल भेल
कृषक के दिन अब फेरसें बहुरलै।
हर-फार-लगना जोगार हरवाहा करै।
बैल के रोॅ घुंघरू के स्वर गुंजी परलै।
फेर से परल पालोॅ बैल के रोॅ कंधा पर
कृषक धरम के रोॅ दायित्व अंकुरलै।
खेत के रोॅ चास फेर सोमार-तेखर भेल
फेर एक बार सब बिहन गजुरलै॥81॥

फेरो से प्रसन्न भेली चंपा के रोॅ कुल देवी
नगर ओनाही धन-धान्य हुए लागलै।
यज्ञ के रोॅ बाद अब यज्ञ के पुरोहित के
दुलहा के जकॉ बड़ी मान हुए लागलै।
जुमि गेल नगर के सब धी-सवासिन अेॅ
ऐंगना में सुमंगल गान हुए लागलै।
कखनों तेॅ शृंगी के स्वरूप के सराहै सब
विभांडक के कभी बखान हुए लागलै॥82॥

दुलहा बनल यहाँ ऋषि शृंगी सुकुमार
जिनकर रूप कामदेव के समान छै।
दुलहिन रूपवती शान्ता सुकुमारी धिया
जेकरोॅ समान तीनों लोक में न आन छै।
पुर के रोेॅ नारी सिनी दू भागोॅ में बॅटि गेल
दोनो मिली-जुली करै उबटन गान छै।
वर-वधु दोनो के चहरि गेल उबटन
चंपा के नगर लागै अजब सोहान छै॥83॥

ऐंगना के मध्य भव्य मड़वा गरैलोॅ गेल
जेकरा कि माली फूल-माला से सजैलकै।
लगहर-पुरहर-हाथी चहुँमुख दीप
कुंभकार लानी क मंडप में बिठैलकै।
आम के रोॅ पल्लव-अक्षत-धूप-दीप आदि
खोजी-खोजी लावी नाई मंडप में धैलकै।
धोबिन सुहाग-भाग धिया के दिऐ लेॅ ऐली
बढ़ई लगनवेदि रचि क बनैलकै।

दोहा -

मंडप के चारो तरफ, लटकल वन्दनवार।
बाहर सहनाई बजै, सोहै तोरन द्वार॥13॥

सब से प्रथम राजा तिलक विधान करि
फल-फूल-अंगवस्त्र-दरब चढ़ैलकै।
मंगल कलश, गुरू-गौरी-गणपति पूजि
ऋषि शृंगी के रोॅ माथें तिलक लगैलकै।
वर-वधु दोनों के रोॅ हरदी चहरि गेल
दोनों के रोॅ रक्षाचक्र कंगन बँधैलके।
सब सवासिन मिली सुमंगल गान करै
शान्ता के वियाह के रोॅ आनन्द मनैलकै॥85॥

शान्ता के रोॅ माता तब परछी क दुलहा के
सादर सम्मान लानी आँगन बिठैलकै।
सखि, सवासिन, वधु, पुर के रोॅ नर-नारी
वर-कनियाँ के लानी मंडप बिठैलकै।
पवित्रीकरण, आचमन, धरती पूजन
न्यास, प्राणायाम, शिखा-वन्दन करैलकै।
कुल पुरोहित तब तिलक विधान हरि
दुलहा के हुन्हीं यज्ञोपवीत पिन्हैलकै॥86॥

नगर के श्रेष्ट जन, पढ़ि मांगलिक मंत्र
वर-वधु के ऊपर फूल बरसैलकै।
वर-वधु दोनों पिन्हलक नया-नया वस्त्र
वरमाला करि गेंठ-बन्धन करैलकै।
कन्या के रोॅ हाथ तब हलदी से पीला करि
वर, वधु के रोॅ पाणिग्रहण करैलकै।
दामपत्य जीवन के सुखसे बितावै लेली
वर-वधु दोनो कें सपथ देलबैलकै॥87॥

सपथ गही केॅ भेल अगनी के सात फेरा
सात जनमोॅ तलक रिस्ता निभावै लेॅ।
सप्तपदी भेल मानोॅ जिन्दगी के सात डेग
दामपत्य भाव, करतव्य अपनावै लेॅ।
सप्तपदी में मिलल जिन्दगी के सात मंत्र
प्रथम भोजन के सतोगुणी बनावै लेॅ।
दोसरोॅ कि बल अेॅ मनोबल भी ऊँच रहेॅ
तेसरोॅ कि धन सद्जुगति से लावै लेॅ॥88॥

सप्तपदी के रोॅ छिक चौथोॅ पद सुख लेली
दुख के भुलावै लेॅ, अेॅ सुख के बुलावै लेॅ।
पंचम वचन छिक कुल परिवार लेली
सब के सहेजी सब रिस्ता निभावै लेॅ।
छठा उपदेश छिक पुत्र उतपन्न हेतु
सातवाँ कि मित्रवत् जिन्दगी निभावै लेॅ।
दामपत्य जीवन के सब से प्रमुख अंग
जनम-जनम सातो वचन निभावै लेॅ॥89॥

हरिगीतिका -

हर एक लौकिक रीत के सब गीत मिलि केॅ गाय छै।
कखनों तेॅ विधकरणी के गितहारिण विधी समझाय छै।
कखनो सवासिन नाम किनको लेॅ केॅ गाली गाय छै।
कखनो त वाभन के कखनियो लौन के गरियाय छै॥3॥

दोहा -

सब पंडित-ज्ञानी लिखै, वर के विष्णु समान।
पर ‘मुद्गल; याचक लिखै, करि केॅ कन्याँ दान॥14॥

सब दानोॅ से पैग छै, कन्याँदान महान।
दाता ऊ, जौने करै, शुभ-शुभ कन्याँदान॥15॥

अगनी के साक्षी राखि राजा रोमपाद तब
शृंगी सुकुमार हाथें कन्याँदान कैलकै।
भेल शंखपाणी शुभ, शुभ सें सिन्दुर दान
फेरो धी सवासिन सिन्दुर झोलवैलकै।
लौकिक वैदिक रीति सब-टा पूरन भेल
दुलहिन-दुलहा के कोहवर लैलकै।
परम आनन्द बसै राजा रोमपाद घर
सखि सब भाँति-भाँति कोहवर गैलकै॥90॥