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अंगिका रामायण / छठा सर्ग / भाग 10 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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यज्ञ में मगन छेला जहाँ कि जहनु ऋषि
गंगा के रौं धार यज्ञ मंडप बहैलकै।
क्रोध में तमकि तब उठला जहनु ऋषि
पल में ही गंगा के रोॅ गरब गिरैलकै।
तीन चूरू में ही पीवी गेला ऊ समस्त जल
तीनो लोक वासी के जे विसमित कैलकै।
भागिरथ जे निहोरा कैलन जहनु के तेॅ
बेटी के रूपौं में गंगा के प्रकट कैलकै॥91॥

दोहा -

गंगा उत्तरवाहिनी, परल जहन्वी नाम।
पावन कैलन आवि कै, अजगैवी शुभधाम॥10॥

मेटै मातु नदीश्वरी, जनम-जनम के पाप।
देव नदी दुखहारिणी, नाशै तीनों ताप॥11॥

मद्गल बड़ मोहक लगै, कल-कल, छल-छल नाद।
मधुर लगै संगीत सन, भेटै सकल विषाद॥12॥

ऋषि फेरो से प्रकट करलन गंगा के तेॅ
जहनु के बेटी जह्नवी कहलैलकी।
जहाँ से चललि गंगा सागर के तट पर
सगर के पुत्र के उद्धार तहाँ कैलकी।
सगरो पूजित भेली तब जह्नवी गंगा
धरती पे पतित पावनी नाम पैलकी।
सब प्राणी लेली भेली सहज सुलभ गंगा
जगत के जीव के रोॅ आतमा जुरैलकी॥92॥

गंगा के रोॅ धार से उद्धार भेल प्राणी के रोॅ
सगरो पुजैली ई सगर-पुत्र तारिनी।
राजा भगिरथ के प्रयास से धरा पे ऐली
भगीरथी गंगा ई जगत उपकारिनी।
जेकरा से धरती के कोख हरियर भेल
जगत के जीव के सकल कष्ट हारिनी।
कोटि-कोटि नमन करै छी जग तारिणी के
जह्नवी गंगा ई सकल दुख हारिनी॥93॥

देव सिनी, आवै, निज जनम जुरावै सब,
कामना पुरावै, संत डुबकी लगाय छैॅ।
जनम-जनम के रोॅ मन के मिटल मल
संग-संग चारो पदारथ मिली जाय छै।
गंगा के रोॅ बुन्द-बुन्द वेद अमरित लिखै
एक बुन्द जल तीनों ताप के मिटाय छै।
भनत विजेता इहो गंगा आगमन कथा
विश्वामित्र राम-लक्ष्मण के सुनाय छै॥94॥

गंगा के किनार पर रात के गुजारी तीनों
भोरे-भोर हरसल गंगा पार कैलकै।
गुरू शिष्य चलला विशाल के नगर दिस
जेकरोॅ कि शोभा बड़ी मन के लुभैलकै।
पुछलन रामजी विशाल के विशालियत
कोन राजवंशी एन्हों राज्य के बसैलकै?
कौशिक विशाल के प्राचीन इतिहास तब
पथ मंे ही राम-लक्ष्मण के सुनैलकै॥95॥

जे कथा कि इन्द्र विश्वामित्र के सुनैने रहै
विश्वामित्र राम-लक्ष्मण के सुनैलका।
कश्यप के रानी दिति के रोॅ पुत्र दैत्य भेल
जौने तप करि के अकूत बल पैलका।
रानी अदिति के पुत्र देवता आदित्य भेल
वल के रोॅ संग सब रूप गुण पैलका।
दोनों के विचार भेल अजर-अमर रहौं
इन्हें लेली दोनों एक जुगती भिरैलका॥96॥

सोरठा -

जब अमृत के चाह, बाढ़ल, जुगती में लागल
कैलन बैठ सलाह, अब समुद्र मंथन करब॥13॥

देव आरो दानव के मन में विचार भेल
सागर मंथन करि अमरित पाय लेॅ।
दोनों मिली गेला मधुसूदन मंदार पास
सागर मंथन के रोॅ मथनी बनाय लेॅ।
फेरो दोनों गेला नागराज वासुकी के पास
मंथन के मथनी के जुत बनी जाय लेॅ।
देवता-दानव-नाग आरो परवत चारो
चलला सागर मथी अमरित पाय लेॅ॥97॥

सागर मंथन घड़ी कछुआ बनल हरि
जौने कि मंदार के रोॅ पीठ पर धैलका।
मंथन करैत पाँच वरिस गुजरि गेल
फल बस मंथन के फेन मात्र पैलका।
मंथन करैत एक बरस बीतल तब
वासुकी अचानक वमन विष कैलका।
विष के प्रभाव दसो दिस में बियापी गेल
देवता दानव सब त्राहिमाम कैलका॥98॥

विष के प्रभाव से विकल भेल सब प्राणी
तब सब देव महादेव के बोलैलका।
विष के प्रभाव से जगत के रोॅ त्राण हेतु
सब देव शंकर के याचना करलका।
परम कल्याणकारी आसुतोष महादेव
जगत कल्याण हेतु विष पान कैलका।
शिव के कृपासे सब देवता प्रसन्न भेल
सब मिली शंकर के असतुति गैलका॥99॥

तीन वर्ष बाद भेल प्रकट सुरा के देवी
विदुषी वरूण कन्याँ वारूणी कहैलकै।
वारूणी के सहजें नकारलक दितिपुत्र
सुरा के नकारी केॅ असुर नाम पैलकै।
सुरा के ग्रहण करि सुर कहलावै देव
सब देव मिली-जुली सोम पान कलकै।
एक साल बाद फेरो प्रकटल कामधेनु
जौने देवलोक के रोॅ शोभा के बढ़ैलकै॥100॥