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अंगिका रामायण / छठा सर्ग / भाग 12 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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आज से पच्चीस वर्ष पहिने के बात छिक
गौतम-अहिल्या एक आयोजन कैलका।
सब देश से अनेक विद्वत समाज ऐलै
हलसि गौतम ऋषि इन्द्र के बोलैलका।
इन्द्र देवता के संग चन्द्रमा पहुँची गेल
दोनों के गौतम ऋषि स्वागत करलका।
आयोजन के अतिथि भेला देवराज इन्द्र
सब जन इन्द्र के रौं जय-जय गैलका॥111॥

दोहा -

आगे पीछे सब करै, ऋषि अरू राज समाज।
फूलै बैठल गर्व से, इन्द्रदेव महाराज॥14॥

युद्ध-राजनीति के रोॅ देव इन्द्रदेव छिक
सब के अपन बल सहजें दिखाय छै।
इन्द्र देवता के जग जीत के निमित पूजै
जग जिति सहजे विजेता बनि जाय छै।
बर-बर असुर के अहंकार नाश करै
जगत पे नेह आरोॅ मेह बरसाय छै।
जिनका ऊपर इन्द्र देवता प्रसन्न भेल
उनका से इन्द्र मित्रवत बनि जाय छै॥112॥

विदुसी अहिल्या पर इन्द्र के नजर गेल
एहनोॅ स्वरूप देवलोक में न आन छै।
एहनोॅ वाचाल-वाकपुट न दोसर कानों
कुशल संचालिका न तनियों गुमान छै।
बड़ी आतमीय बड़ी संयत मिलनसार
हिय में बसल अतिथि के रोॅ सम्मान छै।
इन्द्र देखलक तब देखते ही रहि गेल
सच में अहिल्या देवी केतना महान छै॥113॥

जेकरोॅ कि शील अेॅ स्वभाव के न जोर कहीं
परम शासिन अरू पति व्रतधारी छै।
जेकरोॅ स्वरूप आगू चाँदनी मलीन लागै
रूप नामें रति-शचि सब दुखियारी छै।
टाह-टूह चाँदनी में चन्द्रवदनी अहिल्या
चौदहो भुवन के रोॅ चाँदनी पे भारी छै।
स्वर्ग के रोॅ राजा कहलावै वाला देवराज
काम के अधीन बनी भेल दुराचारी छै॥114॥

मुरगा के जकॉ जब चन्द्रदेव बोलल तेॅ
सुनि केॅ गौतम ऋषि सूतल से जागी गेल।
फेरो कुकरू-कू कहलक पिछुआरी आवी
उठली गौतम ऋषि चन्द्रदेव भागी गेल।
गौतम दृषि के बूझि परल विहान भेल
गंगा असनान के रोॅ तैयारी में लागी गेल।
हाथ में कमंडल कंधा पे मृगछाला धरि
पथ धरते ही हरि भजन में लागी गेल॥115॥

जैसी ना गौतम ऋषि कुटिया से निकलल
तैसी चुपके से इन्द्र कुटिया में आवी गेल।
जैसी पर पुरूष के भेल असपरस कि
आँख खोललकि इन्द्र के देखी चेहावी गेल।
करलकि शोर, हाथ जोड़ी केॅ, निहोरी, फेरो-
मानल न इन्द्र तब हाथ भी चलावी गेल।
ऐसन लगल लात इन्द्र के करेज पर
चित्त भाग गिरल अेॅ उठि केॅ परावी गेल॥116॥

सोरठा -

जगल परोसिन एक, अरू देखलकी इन्द्र के।
तत्क्षण भठल विवेक, अरू पति के जगवै लगल॥15॥

निकलैत् देखलकि इन्द्र के, परोसिन तेॅ
दाँत तले जीह अचरज से दबैलकी।
धीरे-धीरे जुटि गेल पास के अनेक नारी
इन्द्र के धरै के कोनो कोशिश न कैलकी।
लपकी केॅ धरै लेॅ चाहलि जब सदानीरा
उनका मदद एक भी न नारी कैलकी।
नारी सिनी इन्द्र के न दोष गिनलक कोनो,
आवी-आवी लांछना अहिल्या पे लगैलकी॥117॥

इन्द्र छिक देवता, सम्पूर्ण समरथवान
वलवान आगू होठ आपनोॅ हिलैतै के?
इन्द्र के पूजी केॅ सब जन उपकृत भेल
एहनोॅ में इन्द्र पर आरोप लगैतै के?
इन्द्र देवता से नित लोभ-लाभ रखै वाला
सत् उगली केॅ हानी आपनो उठैते के?
सत्य के दुहाई देनिहार के सटल होठ
अनकर मामला में परि केॅ पिसैते के?॥118॥

उधर गौतम ऋषि गंगा के किनार गेला
गंगा के सयन में देखी क चकरावी गेल।
मध्य रात हुऐ के आभास भेल गौतम के
बिना असनान कैने कुटिया पे आवी गेल।
देखलन, भीड़, सुनलन कुटिया के हाल
भागी गेल इन्द्र, चन्द्रदेव पकरावी गेल।
मारलन चन्द्रमा के ऋषि मृगछाला फेकी
भीड़ हाथ परि चन्द्र देवता पिटावी गेल॥119॥

इन्द्र के देलन शाप तमकि गौतम ऋषि
इन्द्र के रोॅ तन में सहस्त्र योनी जागि गेल।
इन्द्र के रोॅ तन पर उभरल योनी देखि
काम के अधीन निशिचर, पीछ लागि गेल।
इन्द्र तब भागि केॅ कमल वन में छिपल
देवगण उनकर खोज करेॅ लागि गेल।
सुरपति के किरति ब्रह्मदेव जानल तेॅ
सिर ठोकि मन में विचार करेॅ लागि गेल॥120॥