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अंगिका रामायण / छठा सर्ग / भाग 2 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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हाथ जोड़ी ठार भेल महाराज दशरथ
ऋषि विश्वामित्र के बहुत जस गाय छै।
अपने के ऐलों ऋषि ऐसन लगल जेना
मरते मनुष के नियुष मिली जाय छै।
निर्जन प्रदेश में जेना कि बरसल मेघ
बॉझिन नारी के जेना कोख हरियाय छै।
लागल हेरैलोॅ होलोॅ संपत बहुरि गेल
व्यथित जेना कि हरखित बनि जाय छै॥11॥

सोरठा -

आनन्दित मन भेल, दरस भेल जे संत के।
तन-मन निरमल भेल, देलन शुभ आसन तुरत॥6॥

अपने प्रथम राजऋषि के रोॅ पद पैलों
अब तप करि ब्रह्म ऋषि कहलाय छी।
अपने के तप के प्रभाव जग विदित छे।
तप बलेॅ अपने त जगत रचाय छी।
अपने के तप से डरल देवराज इन्द्र
तप बलें अहाँ ब्रह्मदेव के डेराय छी।
अपने के पावी ऋषि हम धन्य-धन्य भेलौं
चित से प्रसन्न हम सच बतियाय छी॥12॥

राजा दशरथ तब ऋषि दरसन लेली
हरखित मन चारो पुत्र के बोलैलका।
चारो पुत्र आवी ऋषि चरण परसलन
ऋषि विश्वामित्र से आशिस चारो पैलका।
राम के विलोकि विश्वामित्र जी बेसुध भेल
बेर-बेर ऋषि निज नयन जुरैलका।
राम के रोॅ मुख चाँद, कौशिक चकोर भेल
दरसन सुख ऋषि नैन भर पैलका॥13॥

आवै के उद्देश्य तब कहलन विश्वामित्र
हे नरेश हम एक सिद्धि में लगल छी।
दू-टा इच्छाधारी निशिचर वर तंग करै
सिद्धि के नसावै डरें हम सहमल छी।
मांस अेॅ लिधुर बरसवै यज्ञ वेदी पर
एकरे दोनों के डरे अधिक डरल छी।
ऊ दोनों असुर भ्राता मारिच सुवाहु छिक
जेकरा कारण हम फेर में परल छी॥14॥

यदि हम शाप देॅ केॅ मारै छी निशाचार के
एकरा से तन-निधि हमरे नशाय छै।
शाप के प्रयोग बिन तप बल हीन बूझि
कुटिया में आवी उतपात ऊ मचाय छै।
सुनोॅ राजा असगर हमारे न बात छिक
ऊ समस्त ऋषि के रोॅ यज्ञ नासी जाय छै।
इहेॅ लेली हम ऐलौं अयोध्या नरेश पास
जिनका कि पास अब एकरोॅ उपाय छै॥15॥

सकल विघन दूर करी सकै रामचन्द्र
यज्ञ के सुरक्षा लेली रामचन्द्र चाहियोॅ।
बर उतपाती, निशिचर संत घाती सब
संतन के रक्षा लेली रामचन्द्र चाहियेॅ।
राम राजकुमर में रामत्व लानै के लेली
अस्त्र-शस्त्र दीक्षा लेली रामचन्द्र चाहियोॅ।
देवतो से उच्च कोटि मानव जाति के छिक
एकरोॅ परीक्षा लेली रामचन्द्र चाहियोॅ॥16॥

दोहा -

असुर हनत मंगल करत, सब दिश अवध कुमार।
सब जग के रक्षा करत, करि निशिचर संहार॥1॥

राजा दशरथ विश्वामित्र के बचन सुनि
मनमने अधिक व्यथित हुए लागला।
पुत्र के रोॅ मोह में ग्रसल राजा दशरथ
रसें-रसें तब मुरछित हुए लागला।
एक छन के लेली भी राम से बिलग होना
तन से विलग होलौ प्राण जकाँ लागला।
कुछ पल लेल राजा रहल चेतन्य शुन्य
जगतैं निहोरा करि फेरो कहें लागला॥17॥

अन माँगोॅ, धन माँगोॅ, भूषण वसन माँगोॅ
भवन भुवन माँगोॅ, राजपाट माँगी लेॅ।
हाथी-घोड़ा रथ धेनु सैनिक असंख्य माँगोॅ
दास-दासी सेवक सहस्त्र तोहें माँगी लेॅ।
माँगी लेॅ समस्त राज कोष हे कौशिक मुनि
आरो कुछ मन फूरेॅ उहो सब माँगी लेॅ।
लेकिन न माँगोॅ रघुनाथ मोर प्राण छिक
एकरा से भल मोर प्राण तोहें माँगी लेॅ॥18॥

ऋषि सनमुख फेरू बोलला अवधपति
राम छै किशोर अभी युद्ध के न ज्ञान छै।
एकरा से नीक होत, राज के रोॅ सेना माँगोॅ
युद्ध में प्रवीण जे चतुर गुणवान छै।
सुरवीर सेना जे कि युद्ध में पारंगत छै
जेकरा लेॅ निशिचर धूल के समान छै।
ओकरो से नै तेॅ यज्ञ रक्षा में चलब हम
हमरा तेॅ युद्ध केरोॅ अनुभव-ज्ञान छै॥19॥

युद्ध लेली राम के औचित्य पे विचार करोॅ
बिन अनुभव राम कोन विधि लड़ता?
अपनोॅ सुरक्षा के भी जिनका कि ज्ञान नै छै
यज्ञ के सुरक्षा राम कोन विधि करता?
सब विधि नीक होत अपने चलब हम
हमरोॅ नेॅ बाल बाकाँ निशिचर करता।
जब तक यज्ञ होत रहब अटल हम
हमरा आगू न महाकाल भी ठहरता॥20॥