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अंगिका रामायण / छठा सर्ग / भाग 5 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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वहाँ से चली के राम लखन कौशिक संग
होतें गंगा पर एक वन के देखलका
हिंसक जनावरोॅ से भरलोॅ ई जंगल में
पक्षी के रोॅ कलरव स्वर भी सुनलका।
पुछलन रामचन्द्र कोन वन छिक नाथ
तुरते कौशिक इतिहास बतलैलका।
‘मलद्’ ‘कलुष’ जनपद इतिहास कथा
वन परिपेक्ष में ही कौशिक सुनैलका॥41॥

सोरठा -

मोहक लगै निसर्ग, देखि लुभैला राम जी।
वहेॅ जगह छै स्वर्ग, जै ठाँ हरियाली बसै॥8॥

कहलन विश्वामित्र वृतासुर वध भेल
ब्रह्म हत्या पाप देवराज के जे धैलकै।
इन्द्र के रोॅ दशा देखि धरति द्रवित भेली
एक भाग पाप तब धरती उठैलकै।
वहेॅ पाप के रोॅ पावी धरती बंजर भेल
पाप के दोसर भाग वृक्ष सिर धैलकै।
वहेॅ पाप तब गोन्द बती केॅ प्रकट भेल
पाप के तेसर भाग नदी अपनैलकै॥42॥

इन्द्र के रोॅ पाप जब नदी अपैनलकी त
झाग बनि-बनि के ऊपर छितरावी गेल।
पाप के रोॅ शेष भाग नारी अपनैलकी त
मासिक धरम बनि नारी के छुतावी गेल।
चार भाग भेल पाप तब इन्द्र मुक्त भेल
देवराज आवी तब गंगा में नहावी गेल।
देवराज के मनोॅ के सब मल धुनि गेल
तब से ई जनपद ‘मल्ल’ कहलावी गेल॥43॥

कुछ काल बाद यहाँ तारिका यक्षणी ऐलै
जेकरोॅ स्वरूप सुन्द दैत्य के लुभैलकै।
सुन्द दैत्य छेलै निशिचर जम्भ के रोॅ पुत्र
जेकरा से ताड़िका विवाह आवि कैलकै।
यक्षणी ताड़िका सुन्द दैत्य के संगत पावी
निशिचर धरम सहजे अपनैलकै।
ओकरे से मारिच-सुबाहु के जनम भेल
दोनो सूरवीर निशाचरी बल पैलकै॥44॥

पुछलन रामचन्द्र ताड़िका के जन्म कथा
कहाँ से ऊ यक्षणी अपार बल पैलकै?
नारी भेॅ केॅ ताड़िका कहिने नरभक्षी भेली
कहिने यहाँ पे उतपात ऊ मचैलकै?
राम के जिज्ञासा बूझि बोलला कौशिश मुनि
तपसी सुकेत यक्ष बड़ तप कैलकै।
यक्ष के रोॅ तप से प्रसन्न भेल ब्रह्मदेव
वहेॅ तप के रोॅ फल ताड़िका के पैलकै॥45॥

बेटा आरू बेटी में नेॅ फरक मानी सुकेत
भाँति-भाँति युद्ध कला ओकरा सिखैलकै।
सुन्द के प्रभाव में भ्रमित भेली ताड़िका तेॅ
ऋषि-मुनि सब के रोॅ मारी-मारी खैलकै।
ओकरे प्रभाव में परी केॅ नरभक्षी भेली
घूमि-घूमि तब उत्पात बड़ी कैलकै।
कुम्भज के हाथ से मारल गेल सुन्द दैत्य
ताड़िका शापित विकराल रूप धैलके॥46॥

दोहा -

जे नारी हिन्सक बनै, से नारी वध जोग।
अबला-सबला छोड़ि केॅ, वला कहै सब लोग॥5॥

तब से ही ताड़िका बसल आवि ‘मल्ल देश’
आवी के यहाँ के सब रौनक उजारलक।
यज्ञ के मिघारै, ऋषि-मुनि के रोॅ मारै, आरू
वन के उजारै ऊ अजीव रूप धारलक।
कहलन ऋषि, राम एकरोॅ तो नाश करोॅ
जौने सब संत के बहुत परितारलक।
एक तोरा छोड़ी केॅ मरत ई नेॅ दोसर से
विश्वामित्र ताड़िका के मरण उचारलक॥47॥

नारी के रोॅ नाम पर राम जी ठिठकि गेला
एक रघुवंशी केना अबला के मारतै।
भेल रघुवंशी बीच एक पर एक वीर
नारी के मारी केॅ केना वीरता बघारतै।
बोलल कौशिक ताड़िका के अबला नेॅ जानोॅ
ताड़िका के बल, वीर सहस्त्र संहारतै।
एकरो जोॅ वध तोहें अनुचित मानवेॅ तेॅ।
जानि लें कि निशाचरी केतना के मारतै॥48॥

कहलन विश्वामित्र नारी के सहज गुण
पूजनीय वहेॅ जौने घर के शृंगार छै।
जेकरा में शील-गुण-यश-मान-लोक-लाज
जेकरोॅ स्वभाव सौम्य सुन्दर विचार छै।
जेकरा में सब जग मंगल के भाव बसै
जेकरोॅ कोमल हिय परम उदार छै।
दया के समुद्र जौने, ममता के सूरत जे
माता समतुल्य के नमन बार-बार छै॥49॥

ताड़िका में कहीं नै छै नारी के सहज गुण
यक्षिणी रही केॅ भी निशाचरी समान छै।
जेकरा कि डरें छै त्रसित सब संत जन
जेकरा से तपसी के संकट में जान छै।
ऋषि-मुनि त्रासक जे, यज्ञ के विनाशक जे
शुद्ध नर भक्षिणी, विचित्र खान-पान छै।
तनियों संकोच बिन ताड़िका के वध करोॅ
संत के रोॅ त्राण महापुण्य के समान छै॥50॥