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अंगिका रामायण / छठा सर्ग / भाग 7 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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अगनि-वायव्य अस्त्र, यमदण्ड, क्रौच अस्त्र
सब-टा उत्तम अस्त्र राम के थम्हैलका।
निशिचर वध में बहुत उपयोगी अस्त्र
कंकाल, मूसल घोर कपाल थम्हैलका।
देलन गंधर्व सिनी सब सम्मोहन अस्त्र
विद्याधर जे उत्तम खड़ग थम्हैलका।
कामदेव देलकाथ मदन दूर्जेय अस्त्र
पिशाचोॅ के प्रिय मोहनास्त्र नाम धैलका॥61॥

सोरठा -

भाँति-भाँति के अस्त्र, विविध नाम-गुण-काज के।
भेंटल अनुपम शस्त्र, पैलन राम अजेय निधि॥10॥

सत्यवान, सत्यकृत, प्रतिहार प्रांगमुख
सचिबाहु आरो महाबाहु अस्त्र पैलका।
दृढ़नाभ, पद्मनाभ, महानाभ, महाअस्त्र
सुनाभ, स्वनाम नाम दिव्य अस्त्र पैलका।
कोनो-कोनो अग्नि के समान दिव्य तेज वाला
कुछ धुमकेतु के समान अस्त्र पैलका।
कोनों चाँद-सूरज के जेहनोॅ प्रकाशवान
एक पर एक अनमोल अस्त्र पैलका॥62॥

धैलकाथ तामस-महाबली सौमन अस्त्र
सूर्य देवता से तेजप्रभ अस्त्र पैलका।
सोम देवता से राम पैलका शिशिर अस्त्र
त्वस्टा से रामजी दारूण अस्त्र पैलका।
मन से ‘शीतेष अस्त्र’ मन के गति से चलै
भाँति-भाँति के रोॅ अस्त्र कौशिक थम्हैलका।
गुरु के रोॅ कृपा से मिलल सब अस्त्र-शस्त्र
राम जी सहजता से सब अपनैलका॥63॥

भाँति-भाँति अस्त्र-शस्त्र देलकाथ विश्वामित्र
सब के अलग गुण धर्म बतलैलका।
कोन-कोन देवता के हाथ शोभै कोन अस्त्र
सब के प्रयोग विधि सहजें बतैलका।
खास करि सारंग-पिनाक-अजगव धनु
जेकरोॅ विशेषता कौशिक समझैलका।
जौने अस्त्र सहजें ही पैलकाथ रामचन्द्र
करि केॅ जतन कभी देवतो न पैलका॥64॥

सब अस्त्र-शस्त्र के अदृश्य करि रामचन्द्र
कुछ तरकस कुछ चित बीच धैलका।
बैठी केॅ पूरब मुख राम-लछमण संग
सब के प्रयोग विधि फेरो बतलैलका।
फेरो विश्वामित्र जी के चरण परस करि
आगे दिस वहाँ से गमन सब कैलका।
रसता में फेरो निशिचर उतपात कथा
चलैत-चलैत ऋषि कौशिक सुनैलका॥65॥

बोललाथ विश्वामित्र एक बात सुनो राम
ताड़िका के जैसन अनेक बलवान छै।
एक पर एक नरभक्षी विकराल सब
कखनी प्रकट होतै केकरो न भान छै।
पूरे दण्डकारण्य ही निशिचर से पटल
मायावी के बल के न कोनो अनुमान छै।
तोरे एक आस पर एक के टिकल प्राण
सब ऋषि-मुनि के रोॅ संकट में जान छै॥66॥

सोरठा -

हे रघुनन्दन राम तों जग के मंगल करों।
लगबोॅ पूर्ण विराम, निशिचर के आतंक पर॥11॥

रामचन्द्र जब तोहें राजा के दायित्व लेवेॅ
चौदहो भुवन के उद्धार कौने करतै?
आसुरी आतंक से व्यथित भेल सब जन
ऋषि मुनि के रोॅ उपचार कौनें करतै?
रावण के डर पसरल अब डेगे-डेगे
धरम के तरणी के पार कौने करते?
रावण के बाहू में प्रचण्ड चन्द्रहास सोहै
ओकरा से आवी तकरार कौने करतै?॥67॥

विश्वामित्र जी के बात घुरियावै बेर-बेर
गुरु जी के बात पे विचार तेॅ जरूरी छै।
अवध के राज तेॅ सम्हारि लेतै कोनो भाय
असुर से जग के उद्धार त जरूरी छै।
बेर-बेर रामचन्द्र मन मंे विचारे करै
ऋषि मुनि के रोॅ उपचार तेॅ जरूरी छै।
मनेमन रामचन्द्र कैलन परन एक
आततायी असुर संहार तेॅ जरूरी छै॥68॥

वहाँ से चलल ऐला सिद्ध-आसरम तीनों
सिद्ध-आसरम के रोॅ यश ऋषि गैलका।
इहेॅ सिद्ध-थल छिक जहाँ विष्णुदेव आवी
अपने अनन्त काल तप हुन्हीं कैलका।
इहेॅ सिद्ध थल छिक जहाँ भगवान-विष्णु
दाता से ऊ वामन भिखारी रूप धैलका।
बड़ी अभिमानी छेलै वली विरोचन पुत्र
मान भग जिनकोॅ वामन देव कैलका॥69॥

कहलन विश्वामित्र इहेॅ सिद्ध थल छिक
जहाँ कि अपन एक कुटिया सुहाय छै।
यहीं पर आवी के मिंघारै यज्ञ के असुर
मारिच-सुबाहु दोनों बहुत सताय छै।
राम के विलोकि हरखित भेल यति सब
राम के दरस पावी फूले न समाय छै।
राम लछमण संग कौशिक विचार करि
यज्ञ उतजोग मंे फेरू से लगि जाय छै॥70॥