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अंगिका रामायण / छठा सर्ग / भाग 8 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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ऋषि विश्वामित्र जी के यज्ञ शुभारंभ भेल
फेरो छह दिन के संकल्प हुन्हीं धैलका।
राम लक्षमण जी सजग प्रहरी बनल
छह दिन-रात हुन्हीं जागि केॅ बितैलका।
छठा दिन यज्ञ के आगिन प्रज्वलित भेल
विधिवत कौशिक हवन शुरू कैलका।
यज्ञ के सुगन्ध दशो-दशा में पसरि गेल
दसो दिगपाल के प्रसन्न हुन्हीं कैलका॥71॥

दोहा -

भेल यज्ञ आरम्भ जब राम भेल रखवार।
हरसल विश्वामित्र ऋषि, सजल सत्य दरवार॥7॥

यज्ञ के सुगन्ध पावी, मारिच सुबाहु दोनों
वैसी ना फेरू ऊ विकराल रूप धैलका।
मेघ के समान गरजन करि झपटल
ऊपर से रक्त आरू मांस बरसैलका।
बिन फर के रोॅ वाण मारलन रामचन्द्र
मारिच के हुन्हीं सत् योजन पठैलका।
फेरो अग्निवाण के संधान करलन राम
सुबाहु के छाती पर हानि केॅ चलैलका॥72॥

असुर के वध भेल, यज्ञ के सुरक्षा भेल
सब देव-मुनि मिली जय-जय कैलका।
सब के लगल सुमंगल होनिहार अब
राम के विमल यश सब मिली गैलका।
करि केॅ अपन यज्ञ सफल कौशिक मुनि
जनक के यज्ञ के रोॅ चरचा चलैलका।
शुरू होत मिथिला नगर के धनुष यज्ञ
देशे-देश सिरध्वज ढोलहा पिटलैका॥73॥

देखब धनुष यज्ञ संग में पिनाक पूजा
मन में बिचारी केॅ लखन जी हरसलै।
मनेमन शिव के पिनाक के प्रणाम करि
मंगल विचारी केॅ सारंगधर हँसलै।
मिथिला नगर दिश चलला कौशिक मुनि
मंगल मूरति छवि चित आवी बसलै।
जौने दरसन पावै युगल किशोर के रोॅ
ओकरोॅ जीवन धन्य, जिन्दगी सरसलै॥74॥

वन देवी-देवता से माँगी केॅ आदेश राम
मिथिला नगर दिश कदम बढ़ैलका।
मारग में विश्वामित्र अनेक पुराण कथा
सप्रसंग राम-लछमण के सुनैलका।
पहिने कहलकाथ राजा कुश के रोॅ कथा
ब्रह्मा जी के जे पुत्र ब्रह्मपुत्र नाम पैलका।
व्याह भेल उनकोॅ विदर्भ-राजकन्या साथें
जिनकोॅ से ब्रह्मपुत्र चार पुत्र पैलका॥75॥

कुश के रोॅ चारो पुत्र में प्रतापी कुशनाभ
जौने कि महौदै नाम नगर बसैलकै।
कुशनाभ के रोॅ व्याह भेल अपसरासंग
धृताची से एक सौ कन्याँ रत्न पैलकै।
कुशनाभ के रोॅ कन्याँ सब बड़ी रूपवंती
अनचौके से पवन देव से लुभैलकै।
कामना सफल जब भेल न पवन के त
सब सुकुमारी के शापित हुन्हीं कैलकै॥76॥

सोरठा -

पवन देलका शाप, जा ताहें कुब्जा बनोॅ।
मिटतोॅ हय संताप; जै दिन मिलतोॅ योग्य वर॥12॥

चूली मुनि कैलकै गंधर्व कन्याँ से विवाह
उनका से ब्रह्मदत्त नाम पुत्र पैलकै।
सब कन्याँ कुशनाभ उनके वियाहलन
सब कन्याँ पुरूव कंचन देह पैलकै।
कुछ काल बाद कुशनाभ के रोॅ पुत्र भेल
जौने कि प्रतापी ऋषि गाधी नाम पैलकै।
वहेॅ गाधी कुल में हमर भी जनम भेल
कही विश्वामित्र कथा के आगू बढ़ैलकै॥77॥

अपनों बहिन के रोॅ नाम तब विश्वामित्र
सत्यव्रत धारी सत्यवति बतलैलकै।
जेकरोॅ वियाह भेल ऋचिक मुनि के संग
नदी रूपोॅ में जौने कौशिकी नाम पैलकै।
तब से बसलौं आवी कोशी के किनार पर
कोशी कात के रोॅ भूमि मन के लुभैलकै।
निज कुल के रोॅ कथा कहि केॅ कौशिक मुनि
रात सोनभद्र के रोॅ तट पे बितैलकै॥78॥

वहाँ से चली केॅ तीनों पहुँचल गंगा तट
दरस-परस असनान-पान कैलकै।
विधिवत करि केॅ पितर के रोॅ तरपन
विश्वामित्र गंगा के महातम सुनैलकै।
कही विश्वामित्र जी भागिरथ प्रयास कथा
त्रीपथगामिनि गंगा के रोॅ यश गैलकै।
राजा भगिरथी के रोॅ अथक प्रयास बस
जेना देवनदी भागिरथी नाम पैलकै॥79॥

मैना के रोॅ जेठ बेटी पतित पावनि गंगा
देवता के काज लेॅ हिमाचल पठैलकै।
दोसरोॅ बेटी जे रहै गौरा, गौर वर्ण वाली
उनकर व्याह महादेव संग कैलकै।
पहिने त भेली देवलोक में प्रकट गंगा
फेरो धरती के सब पाप दूर कैलकै।
धरती के पाप दोष नासी भागिरथी गंगा
यहाँ से रसातल के राह हुन्हीं धैलकै॥80॥