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अंगिका रामायण / तेसरोॅ सर्ग / भाग 12 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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राजा आरो घोड़ा दोनो थकल प्यासल बूझि
तब कपटी मुनि सरोवर देखैलकै।
मिट गेल प्यास आरु सब टा थकान तब
कपटी मुनि अपन कुटिया में लैलकै।
सादर सम्मान देॅ केॅ आसन बिठाय मुनि
मुनि के अपन सच नाम न बतैलकै
कहलक हम छी प्रताप भानु के सचिव
नाम पहचान सहि अपनोॅ छुपैलकै॥111॥

हम छी सामान्य जन शौकिन शिकार के रोॅ
आरो कोनो दोसर न परिचै विशेष छै।
करते शिकार हम रसता भटकि गेलौ
प्रतापी प्रतापभानु हमरोॅ नरेश छेॅ।
करैलेॅ शिकार असगर बने वन फिरौं
केवल शिकार बस हमरोॅ उदेश छै।
आरो कि अपन हम परिचै विशेष कहोॅ
हम छिकौ सचिव शिकारी के रोॅ भेष छै।112॥

रात अँधियारोॅ जानि बोलल कपट मुनि
रात भर रूकि जा सबेरे तों निकलिहोॅ।
घनघोर जंगल के रसता अबूझ बड़ी
यहाँ रूकि अपनोॅ थकान नाश करिहोॅ।
बगल के वृक्ष में ही बाँधि द अपन घोड़ा
दोनों मिली रात भर हरि के सुमरिहोॅ।
करै लेॅ चाहै छी हम तोॅरोॅ उपकार अब
अपनोॅ मानोॅ में कोनो कामना के धहिहोॅ॥113॥

जेना कि बहेलिया के बाँसुरी के तान सुनी
मोहक हिरण आबी खुद बंधी जाय छै।
जेना कि कमल के रोॅ कोमल फाँसो के बीच
आबी केॅ भँवर अपने ही फँसी जाय छै।
जेना कि चकोर आग चाँद के प्रसाद बूझी
चाँद के रोॅ चाहत में लपकी केॅ खाय छै।
वैसी ना बाहर के आडम्बर के सच मानी
संत के कपट में सुजन फँसी जाय छै॥114॥

दोहा -

मीड़ बोल सुनि केॅ फँसल, राजा भानुप्रताप।
फँसि कपटी के पेंच में, आप रहल नै आप॥19॥

बड़ी मीठ-मीठ बालै छेलै ऊ कपटि मुनि
मन में ऊ कपटी-कुचाल-छल भरने।
एक तेॅ ऊ बेरी छेलै, दोसर स्वजाति छलै
राजा छिनै के छलै गलानी चित धरने।
मुनि के प्रतापभानु सिद्ध संत बूझि गेल
रहल स्वप्रेम बस चरण पकड़ने।
कहलक मुनि सब गरिबोॅ के एक नाम
विधि ही छै हमरोॅ भिखरी नाम धरने॥115॥

‘एकतनु’ जानि क न करोॅ अचरज तोहें
तप वलें दुनियाँ में कुछ भी आसान छै।
तप वल से ही हरि जग के पालन करै
तप वल से विधाता करै निरमान छै।
तप वल से ही शंभु सृष्टि के संघार करै
सूरज के तप फल नबका विहान छेॅ।
तप के प्रभाव सब जानै सिद्ध संत जन
तप के ही बस में सदैव भगवान छै॥116॥

दोहा -

‘काग भुसुण्डी तप वलेॅ तजै न अपनोॅ देह।
मुनि बोलल-राजा सुनोॅ, करोॅ न तों संदेह॥20॥

फेरू ‘एकतनु’ कहेॅ लागल पुरान कथा
करम-धरम-इतिहास के बतैलकै।
ज्ञान अेॅ विज्ञान कथा, जग उतपत्ति कथा
पालन-संघार-बिस्तार से बतैलकै।
सुनि तपसी के बस भेॅ गेला प्रतापभानु
तब ऊ अपन नाम सच बतलैलकै।
‘गोपनीयता हरेक देश के धरम छिक’
”झूठ राजनीति के शृंगार“ बतलैलके॥117॥

तों छिकेॅ प्रतापभानु, तोरोॅ पिता ‘सत्यकेतु’
गुरू के कृपा से हम सब बात जानै छी।
हमरा से छिपल न जगत के कोनो बात
हम त पवन के भी रूख पहचानै छी।
अपनोॅ हानी बिचारी सच न कहै छी कहीं
जब कि जगत के मरम सब जानै छी।
तोहरोॅ स्वभाव देखि ममता उमरि गेल
अब होत तोर हित सच हम जानै छी॥118॥

बहुत प्रसन्न भेलौं तोहरा ऊपर, हम
मागि ल तों कोनो वर, जौने मन भाय छै!
तप वलें दुरलभ सुलभ बनै छै राजा
माँगि ल तों जौने सुख तोहरा लुभाय छै।
माँगलक राजा मिरतु-दुख रहित तन
जगत के सब सुख जाहि में समाय छै।
माँगलक बिरिध अबस्था रहित तन
जेकरा से भौतिक समस्त सुख पाय छै॥119॥

माँगलक राजा सौ कलप अकंटक राज
कोनो न हरावें मारेॅ हमरा समर में।
हमरोॅ प्रताप अब सुर लोक तक जानेॅ
हमरोॅ किरती गुजेॅ सब घर-घर में।
कहलन तपसी एहनका होतोॅ परन्तु
एक-टा बाधा छोॅ बड़ोॅ तप के डगरे में।
सब होतोॅ बस एक ब्राह्मण के छोड़ी राजा
ब्राह्मण के तप गुँजै त्रिभुवन भर में॥120॥