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अंगिका रामायण / तेसरोॅ सर्ग / भाग 13 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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जगत में सब से कठीन तप ब्राह्मण के
ब्राह्मण जो रीझै तीनो लोक बस होय छै।
जेकरा ऊपर एक ब्राह्मण सहाय रहेॅ
तेकरोॅ विनाश तीनो काल में न होय छै।
ब्राह्मण के जानोॅ देवता के प्रतिनिधि छिक
धरम के जौने कि काँवर नाकी ढोय छै।
तोरोॅ न विनाश होथौं ब्राह्मण के शाप बिना
ब्राह्मण कुपित फुसो बात पर होय छै॥121॥

दोहा -

बाभन देव समान छै, जानै जगत प्रताप।
विप्र चरित कपटी भखै, श्रोता भानुप्रताप॥21॥

जुगती करी क तोहें ब्राह्मण के बस करोॅ
तीनो काल में न तोरोॅ नाश हुए पारथौं।
हमरोॅ मिलन के प्रसंग के बिसारी राखोॅ
ब्राह्मण के छोड़ी कोनो वाल न बिगारथौं।
ई प्रसंग कभी-कही-कोनो ठाम बाची देबेॅ
एक भूल जिन्दगी के सब सुख जारथौं।
ब्राह्मण अेॅ गुरू जेकरोॅ छै उबारनिहार
सनमुख ओकरा महान-वलि हारथौं॥122॥

कोन विधि होत नाथ ब्राह्मण हमर बस
बोलल प्रतापभानु हमरा बताय देॅ।
तोरोॅ सन दुनियाँ में मोर उपकारी कहाँ
ब्राह्मण रिझावै के जुगति समझाय देॅ।
तपसी कहलकै कि सुनि लेॅ प्रतापभानु
हमरा तों एक उलझन से बचाय देॅ।
प्रण अेॅ परोपकार दोनों में सवल कौन?
मन के रोॅ द्वन्द छिक, बात फरियाय देॅ॥123॥

जब से जनम भेल, तहिया से अब तक
गाँव अेॅ नगर के त मुँह न देखलियै।
बर-बर सब आबी क मनाबी गेल
किनको न, अब तक, घर पर, गेलिए।
लेकिन ई काज बिना गेने त दुसह लागै
द्वन्द बीच हम त उलंग फँसि गेलियै।
बिन गेने तोर काज अब बिगरत जनु
सोची रहलो छी केना रसता निकालियै!॥124॥

बोलल प्रतापभानु एक बात सुनोॅ नाथ
संत के स्वभाव उपकार रत होय छै।
बड़ा आदमी जेना कि छोट पे सनेह राखै
जेना परवत सिर बिरिछ धरय छै।
जेना कि अगाध सिन्धु सिर पर झाग धरै
वसुन्धरा धल निज, सिर पे धरय छै।
वैसी-ना हे नाथ उपकार हमरा पे करोॅ
गुरू-पिता-माता जे बालक पे करय छै॥125॥

बोलल कपटि मुनि मंत्र के प्रभाव जानोॅ
जेतने गुपुत राखोॅ तेतने फलय छै।
मंतर के धार तलवार से भी तेज जानोॅ
पवन के वेग जकाँ मंतर चलय छै।
मंत्र के प्रभाव बाँधि करब तोहर काज
जे न कोनो करि सकै मंत्रर करय छै।
वैसी ना तोहर हित करब प्रतापभानु
जेना उपकार गुरू शिष्य के करय छै॥126॥

कुण्डलिया -

शब्द शक्ति के जानि लेॅ, जैसें गाली एक
चाप बढ़ावै रक्त के, नाशै तुरत विवेक।
नाशै तुरत विवेक नशा के जकतें बौरै,
तखनी गाली महज शब्द नस-नस में दौड़ै।
नै तनियों-सा बोध रहै छै ज्ञान भक्ति के
ऐसन छै परभाव अजूबा शब्द शक्ति के॥1॥

हम छिकौ राजा पाक शास्त्र में प्रवीण सुनोॅ
हमरोॅ बनैलोॅ होलोॅ जौने कोनो खाय छै!
जब हम पकवै छी पाक बसीकरण त
परम विरोधी आबी दस बनी जाय छै।
हमरोॅ मानोॅ त तोहें ब्राह्मण ज्योनार करोॅ
हमरा बुझावै एक सहज उपाय छै।
अपने रिन्हब हम, तोहें परसनिहार
देखिहो ब्राह्मण केना असतुति गाय छै॥127॥

ब्राह्मण उदर में तों अन्न के हवन करोॅ
एकरोॅ बहुत ही मधुर फल मिलतोॅ।
तोहें एक बरस के एहनोॅ संकल्प करोॅ
तोहरोॅ विजय ध्वज धुरि से न हिलतोॅ।
ब्राह्मण जों खुश, उनकर परिजन खुश
ब्राह्मण जों खुश सब देव खुश मिलतोॅ।
ब्राह्मण के पूजन-हवन जप-तप के रोॅ
तोरोॅ अन्न खैनें सब फल तोरे मिलतोॅ॥128॥

तोहरोॅ पुरोहित के हरि क अनाब हम
अपने पुराहित के रूप हम धरबोॅ।
साल भर रहब तोहर भनसिया बनि
ब्राह्मण ज्योनार के परण पूरा करबो।
हम भनसिया आरो तोहें परसनिहार
ऊपर से मंतर बसीकरण भरबोॅ।
जगत विजेता तोहें बनवेॅ प्रतापभानु
तोरा लेली तप के आहुत हम करबोॅ॥129॥

बात गेल पुरन त ‘रात बड़ी चढ़ी गेल
तपसी कहलकै, आराम तोहें करि लेॅ।
सुतले में तोरा हम घर पहुँचाबी देबोॅ
तप के प्रभाव के अपन चित धरि लेॅ।
सब विधि करब तोहर हित सुनोॅ राजा
आतमा में अटल विश्वास तोहें भरि लेॅ।
तोरा से मिलब हम आबी क तेसर दिन
ई रहस्य के तोहें रहस्य जकाँ धारि लेॅ॥130॥