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अंगिका रामायण / तेसरोॅ सर्ग / भाग 14 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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कालकेतु कपढ़ी मुनि के रोॅ परम मित्र
सूअर बनी केॅ जे राजा के भटकैलकै।
राजा सुतलै तेॅ कालकेतु निशिचर ऐलै
आबी केॅ अपन मित्र धरम निभैलकै।
कपटी मुनी के संग निशिचर कालकेतु
छल परपंच रचि योजना बनैलकै।
दोनो के रहै प्रतापभानु से पुरूब वैर
बदला सधावै के जुगत दोनो कैलकै॥131॥

सोरठा -

कलप तरू विश्वास, कपट अमरवेली लता।
घुन-षड-दुरगुण पास, भीतर से दुर्बल करै॥6॥

कालकेतु निशिचर छल में प्रवीण छलै
छल-वल से जे देवतो के भरमैलकै।
एक सौ पुत्तर छेलै आरो सात भाय छेलै
धरती पे जौने उतपात बड़ी कैलकै।
सब के समर में पछारी क प्रतापभानु
राज-पाट ओकरोॅ अपन बस कैलकै।
जान लेॅ केॅ भागी गेल असगर कालकेतु
लुकि-छिपि जंगल में दिवस बितैलकै॥132॥

तपसी अेॅ कालकेतु दोनो ही नरेश छल
दोनो के बसल छल राज मोह मन में।
दोनो राजा ही भानुप्रताप के मारल छेलै
डर से छिपल छलै आवी दोनो वन में।
दोनो के रोॅ शत्रु एक ही प्रतापभानु छेलै
जेकरा कारण दुख भरल जीवन में।
आजु आबी छल में फँसल छै प्रतापभानु
दोनो भिरलोॅ छै वहै जुगती जतन में॥133॥

शत्रु आरो रोग के तों छोट बुझि क न टारोॅ
दोनो के तों जानि लेॅ घातक परिणाम छै।
कहलक कालकेतु आब तों निचिंत रहोॅ
आब त बहुत ही आसान भेलोॅ काम छै।
छन में ही मायावी के माया बिसतार भेल
जे माया के लेली निश्चिर बदनाम छै।
सुतलें नरेश राजभवन पहुँची गेल
निशाचरी माया के अजब सब काम छै॥134॥

राजा के पुरोहित के भेल अपहरण अेॅ
कालकेतु आबी पुरोहित रूप धैलकै।
राजा जब उठल त उठतें चकित भेल
अपना के जब राजभवन में पैलकै।
कहीं ई रहस्य जग विदित न हुए पारेॅ
राजा अब चुपके जंगल रूख कैलकै।
दुपहर चढ़ल त राजा घुरि घर ऐला
ई रहस्य राजा केकरो भी न बतैलकै॥135॥

राजा के रोॅ मन बुद्धि कपटी मुनि में बसै
सुध-बुध तजि कपटी मुनि में रमलै।
पुरोहित रूप धरि आवी गेल कालकेतु
बेसुध बनल राजा छल के न गमलै।
तुरत नौतल गेल एक लाख ब्राह्मण के
आवी गेल सब बिप्र एक टा न कमलै।
छह रस आरो चार तरह पकल पाक
एक लाख ब्राह्मण ज्योनार हेतु जमलै॥136॥

दोहा -

साकाहारी जीव जब, करै मांश आहार।
बदलै मांशाहारि सन, सब ओकरोॅ व्यवहार॥22॥

भाँति-भाँति व्यंजन में मांश के प्रयोग भेल
ई रहस्य त भानुप्रताप भी न जानलै।
उहो में कि भोजन में मानव के मांश होत
ई त कोनो अनुमान में न अनुमानलै।
परम विश्वास राखि कपटी मुनि में राजा
एकरे में तब ऊ अपन हित जानलै।
परसै के बेर बात अपने प्रकट भेल
तब राजा माथ पर हाथ धरि कानलै॥137॥

ब्राह्मण बैठल जब भोजन पंगत पर
भोजन परसतें आकाशवाणी भेॅ गेलै।
जेनाही उठल रहै हाथ में पहिल कौर
आकाशवाणी ने सब के सचेत केॅ गेलै।
ब्राह्मण भोजन तजोॅ, आपन धरम राखोॅ
भोजन में नर-मांश के प्रयोग भेॅ गेलै।
सुनतें आकाशवाणी ब्राह्मण क्रोधित भेल
सब एक स्वर में राजा के शाप देॅ गेलै॥138॥

ब्राह्मण बोली उठल, हे अधरमी नरेश
तोहरोॅ विनाश होतोॅ अधरम काज से।
कुल परिवार के समेत निशिचर होवेॅ
धरम खलित होतोॅ अब तोरोॅ राज से।
हमरोॅ धरम के त राम जी राखनिहार
तोहर व्यतित होतें राज-पाट नाश होतोॅ
एक दिन दूर होवेॅ नृप के समाज से॥139॥

एक बेर फेर भेल वैसी ना आकाशवाणी
कि राजा प्रतापभानु के न कोनो दोष छै।
एक कपटी के रोॅ फेरा में छै परल राजा
भेल अनपेक्षित मर्दो में मदहोश छै।
सुनते आकाशवाणी ब्राह्मण चकित भेल
आरो भानुप्रतापोॅ के उड़ी गेलोॅ होश छै।
राजा गेल वहाँ जहाँ भोजन बनैत रहै
देखलक ठीके बहाँ आदमी के गोस छै॥140॥