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अंगिका रामायण / तेसरोॅ सर्ग / भाग 15 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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कहीं भी न भनसिया ब्राह्मण से भेंट भेल
धरती पे राजा निमझानं भेॅ केॅ गिरलै।
सच-सच बात राजा सब के रोॅ कहीं गेल
सुनते ही तब सब के रोॅ सिर फिरलै।
निकलल शाप कोनो जतन न फिरेॅ पारै।
शाप से प्रतापभानु चारो दिश घिरलै।
सुनि क खबर ई दुखित भेल पुरवासी
लागल सुरूज खनि धरती पे गिरलै॥141॥

दोहे -

मुद्गल कभी न भेल छै, छल के भल परिणाम।
जों कपटी कुछ नै करेॅ, तै पर भी वदनाम॥23॥

कपट और कुछ लै छिकै, छिकै हनित विश्वास।
दोहन करि विश्वास के, कपटी पुरवै आस॥24॥

जब कालकेतु गेल तपसी मुनि के पास
राजा के शापित वाली कथा ऊ सुनैलकै।
दोनों मिली बैठी क प्रपंच बिसतारलक
हारल नरेश सिनी सब के जुटैलकै।
भानु छे ढलान पर, आब ऊ प्रताप कहाँ?
शाप वाली बात बिसतारी क बतैलकै।
हारलोॅ राजा में फेरू भरी क आतम-बल
कालकेतु योजना सभे के समझैलकै॥142॥

योजना समझि सब हारलोॅ नरेश सिनी
डंका पीटी सगरो नगर घेरी लेलकै।
भाँति-भाँति युद्ध भेल, ठाम-ठाम युद्ध भेल
लड़ी-भिड़ी उनका तबाह करी देलकै;
कुल परिवार सब युद्ध में लड़ी मरल
राज-पाट, धन-कोश, सब हरि लेलकै।
लड़ी क मरल युद्ध बीच में प्रतापभानु
समर में पीठ राजा आपनोॅ न देलकै॥143॥

कहै याज्ञवलक जी, सुनोॅ ऋषि भरद्वाज
जिनका से विधना वेरूख बनी जाय छै।
उनकरा स्वजन भी शत्रु समान दिखै
ठाम-ठाम तिनका भी उनका डेराय छै।
हीत-मित-परिजन सब लागै यम सन
रसरी भी साँप जकाँ, उनका बुझाय छै।
अपनोॅ भी घर तब जेल के समान लागै
अपनोॅ ही देश परदेश बनी जाय छै॥144॥

सुनोॅ ऋषि दोसर जनम में प्रतापभानु
सब परिजन निशिचर तन पैलकै।
दस सिर वाला आरू बीस भूज धारी वीर
रावण प्रतापी अतुलित वल पैलकै।
राजा के रोॅ अनुज रहै रेॅ अरिमरदन
अगला जनम कुंभकरण कहैलकै।
राजा के रोॅ मंतरी जे रहै रेॅ धरम रूची
धरम में रूची विभीषण नाम पैलकै॥145॥

राजा के रोॅ पूत, परिजन अेॅ सेवक सिनी
सब आवी संगे निशिचर योनी पैलकै।
बड़ी वलशाली आरू बहुत मायावी सब
तीनों लोक में ई उतपात बड़ी कैलकै।
दुरजन-कुटिल-कठोर-अविवेकी सिनी
हिंसक-दुराचारी-अधरम मचैलकै।
सुर-नर-नाग-यक्ष-किन्नर-गंधर्व आदि
एक-एक करी केॅ ऊ सब के सतैलकै॥146॥

कुण्डलिया -

रावण में गुण बाप के, मिलल वेद के ज्ञान।
माता के गुण आसुरी, तिनकर हय संतान॥
तिनकर हय संतान, असुर दशकंधर प्रतापी।
महिमा बड़ी महान, लोक मंे दश दिश व्यापी॥
जिनकर भ्राता कुम्भकरण अरू भक्त विभीषण।
बैठल तप पर जाय भाय के साथें रावण॥2॥

रावण जनम भेल प्रतापी पुलस्य कुल
उनके से चारो वेद के रोॅ ज्ञान पैलकै।
पिता से मिलल रहै संस्कार तप के रोॅ
तीनो भाय बैठी के कठोर तप कैलकै।
तीनो के तपस्या देखी ब्रह्मा जी प्रसनन भेला
आरो ब्रह्मदेव से ऊ वरदान पैलकै।
दुनियाँ में कोनो शक्ति हमरा न मारी सकेॅ
बस नर-वानर दू जात के दुरैलकै॥147॥

हमहुँ रहौ रेॅ उमा ब्रह्मा के ही संग-संग
रावण के हम दोनों मिली वर देलियै।
तब कुंभकरण के पास हम दोनों गेलौं
आरू भयंकर रूप देखी क सोचलियै।
एकरोॅ आहार से जगत के उजार होत
तब हम दोनों सरसती सुमिरलियै।
उनकर प्रेरणा से माँगलक निन्द्रासन
इन्द्रासन माँगेॅ चाहै निन्द्रासन देलियै॥148॥

विभीषण माँगलक निस्काम भगती अेॅ
हरि के चरण के रोॅ भगती ऊ पैलकै।
तिनकर व्याह भेल सरमा सुन्दरी संग
वज्रज्वाला के कुंभकरण अपनैलकै।
रावण के व्याह भेल मंदोदरी संग-संग
दानवेन्द्र से जे उपहार में ऊ पैलकै।
सागर के मद्ध में सुहावनोॅ लंका नगर
नगर दशानन के बहुत लुभैलकै॥149॥

माता केकसी के संग रावण विचार करै
भाँति-भाँति के अनेक योजना बनैलकै।
लंका निशिचर कुल के रोॅ धरोहर छिक
रावण के तब माता केकसी पढ़लकै।
कोन विधि लंका पर भोर अधिपत्य होत
विधिवत रावण ई योजना बनैलकै।
रावण देखलकै कुवेर के विमान जब
तखने विमान पुस्पक ऊ टिकैलकै॥150॥