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अंगिका रामायण / तेसरोॅ सर्ग / भाग 2 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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राम हनुमंत से मिलन के प्रसंग कहु
सुग्रीव मिताई आरू वाली के मरन के!
अंगद शरण कथा, सागर तरण कथा
लंका आगमन आरू संत विभीषण के!
हनुमंत लाल जी के सिया दरशन कथा
पुनि बिस्तार कहु लंका के दहन के!
राम सेतु बंध, राम-रावण के रण कथा
भेल शरणागत भगत विभीषण के!॥11॥

कोन विधि दसशीश रावण के अंत भेल
कोन विधि राजा भक्त विभीषण पैलकै।
कोन विधि सीता के रोॅ अगिन परीक्षा भेल
कोन विधि अवध प्रवेश राम कैलकै।
फेरो एक बात के विचारी कहु प्राणनाथ
आरो कोन-कोन लीला राम लला कैलकै।
आरो केन्ना प्रजा के समेत प्रभु रामचन्द्र
अवध के छोड़ी क अपन धाम धैलके॥12॥

केना क अरूप राम जग के स्वरूप रचै
केना बिन कर-पग जग विस्तारै छै।
कोना तत्व छिकै जे कि सुरजो में जोत भरै
कोन माया के रची क सगरो पसारै छै।
कोन गिरी-सर-सिन्धु सब के सहेजी राखै
कौन सौर जगत के रूप के सवारै छै।
कोन तत्व छिकै जे कि साँस के रोॅ गति दै छै
भ्रमित मनुज कभी समझेॅ नै पारै छै॥13॥

पारवती के मुखोॅ से निशछल प्रश्न सुनि
शिव राम चरित के दरशन कैलका।
मन में जे मानस के रचिराखने छेलाल
राम के सुमरि ऊ वाहर करि लेलका।
सब से प्रथम बाल रूप के रोॅ ध्यान करि
सादर सम्मान शिव चरण झुकैलका।
राम के जनम के रोॅ कारण बखानै घड़ी
कई अवतार के रोॅ कारण सुनैलका॥14॥

दोहा -

पार्वती के प्रश्न सुनि, हाँसि कहलन वृषकेतु।
सुनोॅ भवानी हरि कथा, राम जनम के हेतु॥3॥

सब से प्रथम वंदौ बाल रूप राम के रोॅ
जेकरा से साधना सफल बनी जाय छै।
जेकरा से सब-टा अमंगल नसावै आरू
याचक आपन मनोकामना पुराय छै।
सब दिश मंगल विचारी शिव आसुतोष
रघुपति कथा पारवती के सुनाय छै।
राम के कथा पवित्र मानस मंदाकिनी छै
जहाँ आवी संत जन डुबकी लगाय छै॥15॥

राम के कथा संदेह-शोक-मोह नाशै वाला
राम के कथा सुनैतें भ्रम भागी जाय छै।
राम के कथा के तों पियूष के समान जानोॅ
किरती में आप अमरत्व जागि जाय छै।
सुनोॅ पारवती वहेॅ जनम सफल जानोॅ
सब तजी जौने राम-नाम गुण गाय छै।
जौने जीभ राम नाम प्रेम से उचारै नाहि
तौने जीभ दादुर के जीभ कहलाय छै॥16॥

जौने मुँह राम के चरित न बखान करै
तौने मुँह के तों स्वान के रोॅ मुख मानी लेॅ।
जौने नैन से न सिद्ध संत के दरस भेल
तौने नैन के तोहंे उलूक नैन जानी लेॅ।
जौने सिर गुरू के समीप नत भेल नाहीं
तौने तितकोहरा समान पहचानी लेॅ।
भनत विजेता चित आसथा सहेजी राखोॅ
रामके स्वरूप अपनोॅ हिय में आनी लेॅ॥17॥

महादेव कहलन गिरिवर नन्दनी हे-
राम जी के कथा कामधेनु के समान छै।
शंसय मिटावै, कलिकाल के नसवै आरू
दोष के दुरावै, सब दुःख के निदान छै।
राम गुण गावै ऊ परमपद पावै आरू
संत के रोॅ भावै जौने किरती महान छै।
गावै सब संत, हरि किरती अनंत जौने
वहेॅ घट-घट वासी राम भगवान छै॥18॥

जिनकर मन, चित बसल अधरम में
जिनका कि बान्ही लेने मोह बरियार छै।
जौने कि अज्ञानी आरू निपट अभागल छै
जेकरा विषय आरू वासना से प्यार छै।
लंपट कुटिल आरू कपटी असंत जौने
भ्रमित चरित्र आरू दूषित बिचार छै।
एहने के मन बीच सदैव संदेह बसै
जिनका न धरम से कोनो दरकार छै॥19॥

दोहा -

सूअर के दृष्टि सदा, सीध-सीध छोॅ हाथ।
उनका आगू व्यर्थ छे, मील-कोस के बात॥4॥

भ्रम भी अजीव खूबसूरत अज्ञान छिक
पश्चिम के पूरब विश्वास से बताय छै।
डूबतें सूरूज में उदित के आभास करै
भ्रमित विश्वास के ही अलख जगाय छै।
किरती के भजै करता के जे दुराय छै।
असतित्व राम के नकारी क अपन नाम
मुढ़ जन राम-शिव-किसन बताय छै॥20॥