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अंगिका रामायण / तेसरोॅ सर्ग / भाग 5 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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व्याकुल व्यथित विन्दा हँकरी क कानै, कहै-
धरती तों फाटोॅ आरो हमरा समाय लेॅ।
लुटि गेल सब, मोह भंग भेल जिन्दगी से
आवेॅ माता तोहें निज अंग से लगाय लेॅ।
कोन सुख लेली देह धरि क रहब हम
जगत में सगर कुलछनी कहाय लेॅ।
बाहरी जगत छोट परि गेल हमरा लेॅ
माता आब हमरा तों कोख में बसाय लेॅ॥41॥

विन्दा के रोॅ व्यथा सुनि फाटल धरा के हिय
महासती विन्दा के बाँहोॅ में भरि लेलकै।
पुरूब प्रसंग के ऊ विष्णु के माया कही क
विन्दा के सतित्व प्रमाणित करि देलकै।
धरती फटल सती विन्दा समाहित भेल
विष्णुदेव पौध में प्रकट करि लेलकै।
भाँति-भाँति औषधीय गुण धारी पौध विन्दा
तुलसी के नाम से पूजित करि देलकै॥42॥

दोहा -

विन्दा अस्थावर बनल, परलन तुलसी नाम।
आरो हरि पत्थर बनल, पूजित शालीग्राम॥9॥

घरे-घरे कहलैली तब विन्दा वष्णु प्रिया
परम सोभाग्य सुखकारी भेली तुलसी।
अचल सुहाग लेली पूजय सुहागवती
जगत के लेली उपकारी भेली तुलसी।
आरती दिखावै माता हरि पटरानी कही
सब के परम हितकारी भेली तुलसी।
जड़-धर-फूल-पात सब में औषध बसै
सकल औषध गुण धारी भेली तुलसी॥43॥

एक ही परम सत्य सत्यनारायण हरि
जिनकर कथा संत घुमि-घुमि गैलकै।
जगत के आसथा के तुलसी में रोपी राखै
भगत के तुलसी महातम सुनैलके।
कामना रहित कोनो कामना सहित पूजै
सब के हरि जी मनोकामना पुरैलकै।
कातिक पुजनिहार प्रेम के प्रतीक मानी
शालीग्राम संग तुलसी के व्याह कैलकै॥44॥

विन्दा भेली तुलसी अेॅ विष्णु शालीग्राम भेल
जालंधर फेरो निशिचर योनी पैलकै।
दश शीश वाला वलशाली दशकंधर ई
जगत रूलावी क रावण नाम पैलकै।
तेकरे विनाश हेतु एक अवतार भेल
आरू ऊ निसाचर के गरव गिरैलकै।
देवता के मान लेली संत परित्राण लेली
भाँति-भाँति लीला प्रभु राम आवी कैलकै॥45॥

एक अवतार भेल नारद के शाप बस
जब देवऋषि शाप हरि जी के देलकै।
नारद के शाप बाली बात गिरिनन्दनी के
अचरज में डारी, चकित करी देलकै।
पुछलन पारवती एक बात कहु नाथ
कोन अपराध प्रभु रमापति कैलकै।
स प्रसंग कथा बिस्तारी कहू प्राण नाथ
नारद परम ज्ञानी शाप कैन्हें देलकै॥46॥

कहलन शिव शुभ कथा सुनोॅ पारवती
ज्ञान के स्वरूप जग अगम अपार छै।
जिनका आतम ग्यान, जगत में ज्ञानी वहेॅ
आतम गियान बिन जगत गमार छै।
कहै याज्ञवलक जी सुनोॅ ऋषि भरद्वाज
ज्ञान जहाँ नाहीं तहाँ निपट अन्हार छै।
भनत विजेता ज्ञान दीप बारोॅ ठाम-ठाम
ज्ञान जोत बिन सत् सुरजो बेकार छै॥47॥

सवैया -

ज्ञान बढ़ै तब मान बढ़ै, अरू
मान बढ़ै अभिमान बढ़ावै।
जों अभिमान बढ़ै त विचार से
पंडित मूढ़ समान बुझावै।
पंडित जौने प्रकाण्ड बनै, तब
एक नया धम-पंथ बनावै।
भेद रची क विभेद करै,
उप भेद कही मत भेद बढ़ावै॥2॥

नारद घुमैत छलै हिमांचल ऐगंना में
रमणीय जगह देखी क मन रमलै।
बैठि गेला बही ठाम प्रेम से समाधि मारी
अखण्ड समाधि बड़ी दिन तक जमलै।
नारद के तप देखी देवराज डरि गेला
पद मोह ग्रसित मनेमन सहमलै।
भाँति-भाँति तब देवराज परपंच रचै
देवराज के कुमति देवतो न गमलै॥48॥

सोरठा -

व्यथित भेल तब इन्द्र, मुद्गल पद के मोह से।
काँपि उठै देवन्द्र, जहाँ कहिं भी तप दिखै॥2॥

नारद के तप भंग करै लेली देवराज
चुपके से रति-पति काम के बोलैलकै।
कामदेव संग आवी गेल रितुराज तहाँ
चारो दिश मह-मह-मह-मह कैलकै।
सूक-पीक तान भरै अपसरा गान करै
भाँति-भाँति नाचि-कुदि उनका लुभैलकै।
सब उतजोग कामदेव के वेरथ भेल
नारद के तप से न कोनो विलगैलकै॥49॥

कामदेव के रोॅ सब जतन विफल भेल
तब कामदेव ऋषि शाप डरें डरलै।
कामदेव हार पारि अति ही विनित भेल
देवऋषि नारद के चरण में परलै।
नारद के मन में न तनियों सा रोष देखी
माँगि केॅ आशिश काम सहजे ससरलै।
सब हाल कहि ऐलै देवराज इन्दर के
सुरपति के मनोॅ में अचरज भरलै॥50॥