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अंगिका रामायण / तेसरोॅ सर्ग / भाग 7 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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राम सुमिरैतें तब राम जी प्रकट भेल
नारद समझला कि भल होनिहार छै।
संतन के परम हितैषी प्रभु रामचन्द्र
जग हितकारी राम परम उदार छै।
कहलन स्वंवर आयोजन के बात ऋषि
कहलन व्याह के रोॅ हमरो विचार छै।
अपनोॅ स्वरूप नाथ हमरा उधार दियौ
एतने कृपा से नाथ हमरोॅ उद्धार छै॥61॥

कहलन राम एक बात सुनोॅ देवऋषि
करब जतन हम तोहर उद्धार के।
जेना कि सफल वैद्य कुपथ बरजि राखै
सब जुगती करै सफल उपचार के।
ओहने करब भल आपनोॅ भगत जानी
बाँधि राखोॅ गाँठ इहो उत्तम विचार के।
दिल में जों राम अेॅ दिमाग मंे जों काम बसै
एहनोॅ सुरत अनभल होनिहार के॥62॥

माँगलन देवऋषि हरि से स्वरूप जब
हरि अरथे ही मरकट रूप पैलका।
हरि पर परम विश्वास राखि देवऋषि
सादर स-प्रेम ताथ आपनोॅ झुकैलका।
गरव से गरदन ऊँच करि देवऋषि
स्वंवर में जाय तब आसन जमैलका।
लेने जयमाला विश्वमोहिनी बाहर ऐली
उचकि-उचकि ऋषि चेहरा घुमैलका॥63॥

सोरठा -

चित पर चढै न राम, नारद व्याकुल व्याह लेॅ।
चढ़ल माँथ पर काम, हरि भाया गिरिजा सुनोॅ॥3॥

अजब स्वरूप भेल देवऋषि नारद के
जेकरोॅ मरम कोनो समझी न पैलकै।
जौने-जौने मिलल पुरूष पहचान वाला
नारद कही क सब शीश के झुकैलकै।
विश्वमोहिनी के मरकट के दरस भेल
घुमियो न मुख ऊ नारद दिश कैलकै।
जौने दिश देखै विश्व मोहिनी पतिम्वारा के
तौने दिश नारद अपन रूख कैलकै॥64॥

एहनोॅ आतुर भेल देव ऋषि नारद कि
स्वंबर के मरजादा समझी न पैलकै।
वरमाला लेने विश्वमोहिनी घुमल फिरै
सभा में तेनाही ऋषि आसन हिलैलकै।
राम के भगत के छै काम नचावनिहार
सुन्दर भरम जे ऋषि के भरमैलकै।
नारद के संग शिव गण जौने ऐलोॅ रहै
देखी क उतावला ऊ गण मुसकैलकै॥65॥

नारद के देखि-देखि हँसै दोनों शिवगण
अजब स्वरूप करूणा निधान देलकै।
ऋषि के रोॅ पीछू-पीछू चलै दोनो शिवगण
वाह-वाह कहि क गुमान भरि देलकै।
भगत के सदैव कल्याण चाहै वाला हरि
आजु देवऋषि के कल्याण करि देलकै।
हँसियो मजाक न समझि पैला देवऋषि
गरव से सिर के उतान करि लेलकै॥66॥

वहेॅ सभा बीच राजकुमर के रूप धरि।
अपने विराजमान छेला भगवान भी।
जयमाल मिलल कुमर रूप हरि के ही
हरि के समान न दोसर रूपवान भी।
भगत के मोह भ्रम-फाँस से निकलौ लेली
रचै परपंच खुद करूण निधान भी।
भूप सिनी जौने कि गरब से फूलैत रहै
बहुत दुखित भेल; मन निमझान भी॥67॥

शिव के रोॅ गण उपहास करि नारद के
उनकरा दिश ऊ कमंडल बढ़लकै
हरि से जे माँगने छेलाथ रूपवान रूप
कपि के स्वरूप तब जल में दिखैलकै।
देखते ही देवऋषि तुरते बिगरि गेल
पहिने ई बात कहिनें न ई बतैलकै।
एतनो मे बुझल कि देवऋषि नारद छी
उलटे हमर उपहास ई उड़ैलकै॥68॥

दोहे -

कामजीत भी नै रहल; नै भेटल जयमाल।
हँसल शंभुगण देख केॅ; नारद के हय हाल॥12॥

शाप दै लेॅ लेलका कमंडल से जल तब
दोनों शिव के रोॅ गण जान लेॅ केॅ भागलै।
कहीं शाप देॅ केॅ यही ठाम न भसम करेॅ
दोनो गण इहेॅ अनुमान लेॅ केॅ भागलै।
मिलल दोनों के निशिचर हुऐ के रोॅ शाप
भगवन पर क्रोध तीन गुण बाढ़लै।
मन में बेचैनी आरो क्रोध से शरीर काँपै
कमलापती के ऊ पिछेड़ करेॅ लागलै॥69॥

मारग में नारद के श्रीपति से भेंट भेल
देखलन साथें विश्वमोहिनी कुमारी के।
जिनका कि सत सब जग उपकारी कहै
देखलन नारद अपन अपकारी के।
देखते ही तलबा के लहर मगज पर
सुरू करि देलन बौछार तब गारी के।
बड़ी इरसालु-धूर्त-स्वारथी अेॅ चालू राम
चूनी-चूनी गारी बकौ कपटी जोगारी के॥70॥