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अंगिका रामायण / तेसरोॅ सर्ग / भाग 8 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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सागर से निकलल चौदह रतन तब
शिव के सहज जानी जहर पिलैलका।
अपने त लछमी के वाम दिश धारलन
असुर के मदिरा के कलश थम्हैलका।
अपने पराय गेला अमरित घट लेॅ केॅ
आरो देवता जाति के अमर बनैलका।
हरदम मन में कपट व्यवहार राखै
भगतो के जग उपहास ई करैलका॥71॥

परम स्वतंत्र कोनो रोकै-टोकै वाला नै छोॅ
मन में जे फूरै छोॅ तों कहेॅ काज करै छेॅ।
ऊँच के रोॅ नीच आरू नीच के रोॅ ऊँच करोॅ
होनी के अहोनी; अनहोनी होनी करै छै।
अनकर हित देखि सदैव जरनिहार
अनकर शुभ में विघन तोहे करै छेॅ।
तोहरोॅ ऊपर जौने परम विश्वास राखै
ओकरोॅ विश्वास के भंजन तोंहें करै छै॥72॥

कहलन नारद कि ठिके करलेॅ तों नाथ
अबकी सबक हम तोहरा सिखाय छी।
बहुत के साथ तों बहुत बेर छल कैलेॅ
अबकी तोहर हम आदत भुलाय छी।
भगत के शाप अब शीश पर धरोॅ हरि
अखनी से हम अब तोहरा दुरावै छी।
मन त करै छेॅ अभिशाप सें भसम करौं
चीर अविनाशी बूझी हम सकुचाय छी॥73॥

सोरठा -

उतरल सिर से काम; क्रोध चढ़ल तब माथ पर।
भेल विधाता वाम; माा महा तमोगुनी॥4॥

कहलन नारी लेली हमरा बेचैन कैलेॅ
ई बेचैनी तोहरो पिछेर कभी करतोॅ।
स्वंवर से जेना विश्वमोहिनी हरण कैलेॅ
तोहरो नारी के निशिचर कानो हरतो
जेना तोहेॅ हरि, करि देलेॅ मरकट रूप
वहेॅ मरकट उपकार तोरोॅ करतोॅ।
हमरोॅ ई शाप अखनी से गाँठ बान्ही राखोॅ
बिन भोगने ई शाप टारने न टरतोॅ॥74॥

नारद के शाप शीश धरलन रमापति
छन में ही आपन माया समेट लेलका।
देखलन नारद न कहि विश्वमोहिनी के
आरो न कहीं ऊ लछमी के ही देखलका।
फटते ही माया मन के विकार मिट गेल
नारद अपन चित राम दिश कैलका।
बार-बार दोष ऋषि आपनोॅ स्वीकार करि
कमलापति के ऊ चरण धरि लेलका॥75॥

नारद के मन में बसल अपराध बोध
ऋषि के जे अधिक व्यथित करि देलके।
बड़ी अजगुत छै ई माया भगवान के रोॅ
जौने कि भगत के भ्रमित करि देलकै।
एक ही श्रीपति सब भ्रम के मिटावै वाला
फेरो ज्ञान जोत प्रज्वलित करि देलकै।
देलकाय नारद के शिव के सहस्त्र नाम
तप-वल फेनु से उदित करि देलकै॥76॥

पावी शिव-सत्-नाम चलि भेला देवऋषि
शिव जी के गण देवऋषि के देखलका।
दोनो गण ऐला; दोनों हाथ जोरी ठार भेला
कर जोरी छमा के रोॅ याचना करलका।
दोनो आवी ऋषि के चरण पर गीर गेला
केना होत हमरोॅ उद्धार से पुछलका।
दोनों के विनय सुनी नारद द्रवित भेला
ऋषि तब संत के धरम निमहैलका॥77॥

कहलन नारद कि सुनोॅ शिव गण दोनों
तोरोॅ बाहुबल डरेॅ जब जग डरतोॅ।
तोरोॅ अतुलित धन-वैभव विलोकि जब
सब जग तोरा आगू शिश नत् करतोॅ।
नित बाहुबलें जब जगत के जीत लेवेॅ
जगत उद्धार लेली हरि अवतरतोॅ।
परम, दयालु हरि; जगत कृपालु हरि
निशिचर योनी से उद्धार तोरोॅ करतोॅ॥78॥

सोरठा -

भेल एक अवतार; हरि नारद के शाप बस।
जगत प्रतारनिहार; लंकापति शिवगण बनल॥5॥

एक अवतार के रोॅ कारण इहो भवानी
प्रति अवतार हरि चरित सुहावै छै।
हर एक कलप के हरि अवतार कथा
भाँति-भाँति प्रेम से सुकवि संत गावै छै।
घुमि-घुमि राम के चरित कथा वाँचै वाला
कलप विभेद हरि चरित सुनावै छै।
मोह से ग्रसित जन; कलप विभेद कथा
भ्रमित विचार बस समझी न पावै छै॥79॥

सुनलक भारद्वाज कलप विभेद कथा
जौने भाँति शिव पारवती के सुनैलके।
आरो एक जनम के कारण खगेश सुनोॅ
अलख अगोचर स्वरूप केना धैलकै।
जे कथा जगत के सकल भ्रम नाश करै
हरी क अमंगल के मंगल बनैलके।
कलप विभेद हरि चरित अनंत सुनोॅ
मति अनुसार जौने संत सब गैलके॥80॥