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अंगिका रामायण / दोसर सर्ग / भाग 2 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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ब्रह्मा के रोॅ बात सुनी देव हरखित भेल
सब मिली जुली तब आनन्द मनैलकै।
ढेर काल भेल शिव-पुत्र न प्रकट भेल
तब देवगण मिली जुगति भिरैलकै।
सब देव गेल नीलकंठ महादेव पास
उनकर चरण वन्दन सब कैलकै।
शिव के रोॅ तेज देव हीत में खलित भेल
सब मिली यश महादेव के रोॅ गैलकै॥11॥

सोरठा -

शंकर के आशीष, शीश धरलकै देव गण।
बोलल जगदीश, एक भरोसा तोर बस॥3॥

शिव के रोॅ तेज तब धरती पे व्यापि गेल
अग्नि देव सब के सहेजी भार धैलकै।
अग्नि देव, देवता पवन के सहारा लेॅकेॅ
पतित पावनी गंगा तक पहुँचैलकै।
गिरिवर नंदनी ई त्रिपथगामिनी गंगा
जे आकाश गंगा में सहेजी कोख धैलके।
माता पारवती के रोॅ बड़की बहीन गंगा
बड़की बहीन के रोॅफरज निभैलकै॥12॥

गंगा के रोॅ कात, सरकंडा के रोॅ जंगल में
कार्तिक प्रकट भेला देवता हरसलै।
सब देव दौड़ी ऐला दरसन सुख लेली
सब के रोॅ नेह मेह बनी क बरसलै।
माता गंगा अँचरा में ढ़ाँकी राखलकि शिशु
अधिक प्रसन्न भेली धरती बिहँसलै।
छहो कृतिका के हाथ कार्तिक के सौपी गंगा
अमृत कलस बनी कृतिका में बसलै॥13॥

बालक के रूप लागै दिव्य छह मुख वाला
जौने छहो कृतिका के मन के लुभैलकै।
बारी-बारी सब निज गोद में सम्हारी राखै
बारी-बारी सब देव दरशन सुख चाहै
बारी-बारी सब निज नयन जुरैलके।
कार्तिक कुमार के दरस करी बारी-बारी
शेष-शारदा भी कोनो उपमा न पैलकै॥14।

शिशु के स्वरूप देखी धरती प्रसन्न भेली
निजपुत्र कहि शिशु हिया से लगैलकै।
गंगा निज पुत्र कहि पिलवै अपन दूध
छहो कृतिका अपन छाती से लगैलकै।
निज पुत्र कहि क मगन अग्निदेव भेल
मगन उल्लास देव आनन्द मनैलकै।
शंभु-पारवती दिव्य रूप वाला बालक के
कहि क अपन पुत्र गोदी में उठैलकै॥15॥

सब माता में पूति भेली पारवती माता
कार्तिक समान दिव्य पुत्र जौने पैलकै।
ई गोदी से ऊ गोरी पलटि शिव-पारवती
बेर-बेर बालक के मंगल मनैलकै।
नयन के तब अलौकिक सुख लाभ भेल
भरि नैन बालक के दरसन कैलकै।
शिव पारवती तब बसल कैलाश आवी
जनम उछाह सब मिली क मनैलकै॥16॥

सोरठा -
कार्तिक जनम उछाह, आवि मनावै देव गण।
चित में राखै चाह, हय बालक संकट हरत॥4॥

देवता गंधर्व संग दशो दिगपाल ऐलै
सब के रोॅ महादेव स्वागत करलकै।
देववधु बालक पे अक्षत अेॅ दूब छिटै
आशिर-वचन कहि गोदी में बिठैलकै।
गीत अेॅ संगीत से गुँजित दशो दिश भेल
अपसरा सिनी भाँति-भाँति नृत्य कैलकै।
बहल शीतल-मंद-सुगन्ध वियार अरू
ठामे-ठाम अंवर से फूल बरसैलकै॥17॥

धुम्रहीन आग भेल, जल निरमल भेल
नूतन प्रभात नव रूप में विहँसलै।
सब के रोॅ मन मोहै कार्तिक के बाल लीला
सुन्दर स्वरूप सब के हिय में बसलै।
बेर-बेर पवन उघारी देखै शिशु मुख
फागुनी वियार जकाँ बिहँसी-बहसलै।
खडानन शिशु के रोॅ, पिता शिव-पंचानन
देखि चतुरानन बहुत जोर हँसलै॥18॥

कखनो त बसहा के सिंग के पकड़ि झोलै
कखनो त ढाही वसहा से ही लड़ाय छै।
कभी पारवती के वाहन सिंह संग खेलै
पूँछ खींची भागै, कभी पीठ सहलाय छै।
कखनो त शिव के गला के नाग पकड़ी केॅ
फूक मारै तब नाग दाँत के दिखाय छै।
‘एक दू’ कहि क मुण्डमाल के रोॅ मुण्ड गिनै
कभी मुण्ड के रोॅ दाँत देखि क ठठाय छै॥19॥

कखनो त जटा में ही गंग दरसन करै
कखनो अपन मुँह चाँद से मिलाय छै।
कखनो महादेव के जटा सोझरावै बैठी
जेतने सुधारै, तेतने ही ओझराय छै।
कखनो त माता पारवती के गोदी में बैठी
रूद्र के रोॅ माला धरि शिव-शिव गाय छै।
कार्तिक के बाल लीला देखी माता पारवती
आरो महादेव मने-मन मुसकाय छै॥20॥