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अंगिका रामायण / दोसर सर्ग / भाग 3 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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कार्तिक कुमार कुछ दिन में सयान भेल
अतुलित वल अतुलित बुद्धि पैलकै।
अस्त्र आरो शस्त्र के रोॅ कला में प्रवीन भेल
महादेव अपने से वल अजमैलकै।
तारक असुर सब राह अवरूद्ध करि
जग व्यापि देवता के सिमित बनैलकै।
देवता अधीर भेल शंभु दरशन बिन
शिव दरशन के रोॅ जुगति भिरैलकै॥21॥

दोहा -

मन अधीर, व्याकुल हृदय, मुखरा लगै उदास।
नुकलोॅ छिपलोॅ देवगण, ऐला शिव के पास॥3॥

सब हथियार लेने, बादल के आर लेने
नुकल-छिपल शिवधाम दिस धैलकै।
व्याकुल पपीहा जेना मेघ के शरा गहै
शिव के शरण वैसी देवगण पैलकै।
प्यासल पथिक जकाँ मातली के संग इन्द्र
शिव के शरण आवी शीश के झुकैलकै।
इन्द्र देवता के आगमन से कैलाशपति
नन्दी-भृंगी सब के स्वागत में भिरैलकै॥22॥

कार्तिक कुमार के हजार नैन से विलोकि
देवराज अपना के भाग्यवंत बुझलै।
फेरो शिव के हाथों में धनुष ‘पिनाक’ नाम
‘अंधक-असुर-मरदन-अस्त्र’ सुझलै।
फेरो देखलन अस्त्र-शस्त्र में अभ्यास-रत
कार्तिक कुमार बहु भट संग जुझलै।
कार्तिक कुमार के रोॅ वीरता विलोकि इन्द्र
फेरो अपना के जग जेता जकाँ बुझलै॥23॥

त्रिपुर असुर के संघारक कैलाशपति
देवराज इन्द्र पर नेह बरसैलकै।
शंकर के नेह देखी देवराज धन्य भेल
आदर से माया तहाँ आपनोॅ झुकैलकै।
देवराज इन्द्र के रोॅ संग-संग ऐलोॅ होलोॅ
देवगण सब मिली साष्टांग कैलकै।
सब देवता के मुख मलिन विलोकी शिव
देवता के यश गावी हौसला बढ़ैलकै॥24॥

फेरो महादेव व्यंग्य करि क पुछलकै कि
एक बात देवराज हमरा बताय देॅ।
महापराक्रमी तोहें अस्त्र-शस्त्र से निपुन
अपनोॅ तों डर के औचित्य समझाय देॅ।
दोसरोॅ के तप से डरनिहार देवराज
सत् के परीक्षा के औचित्य तो बुझाय देॅ।
तपसी के तप भंग करै वाला सुरपति
सुर आरो असुर में अंतर बताय देॅ॥25॥

पद के रोॅ मद राखी तपसी के तप तोरै
देवतो के नाम पर अधर्म लिखाय छै।
कही क परीक्षा जे परोक्ष सें स्वारथ साधै
देवतो के पुण्य वहाँ छीन भेलोॅ जाय छै।
निषकाम योगी के पतित करि देवराज
अपनोॅ दायित्व से पतित बनी जाय छै।
धरती पे आवै तब सरग निवासी देव
मानव बनी क सब दुख-सुख पाय छै॥26॥

दोहा -

सत्ता सुख के वास्तें, इन्द्रो रचै प्रपंच।
बचै न सत्ता मोह से, एक्को चरित अवंच॥4॥

धरम के मद जब हदसे अधिक बढ़ै
आसुरी प्रवृति तब आगू बढ़ि जाय छै।
धरम-अधरम के सहजे विभेद मिटै
एहने में असुर सवल बनी जाय छै।
भगती के सब टा सरोवर के जल जरै
अनुपम ज्ञान के कमल मुरझाय छै।
सरधा-विश्वास तब सहजे खलित हुऐ
तारक भी तारका असुर बनी जाय छै॥27॥

विष्णु के सुदरसन जहाँ कि विफल भेल
देवराज के रोॅ वज्र देखी लेने हार छै।
तारका असुर के रोॅ छल-बल-बुद्धि आगू
देवता के सब तेज-पौरूष बेकार छै।
छल बल से असुर, देवता के वार काटै
तारका के वार आगू देवता लाचार छै।
वन के रोॅ आग एक बादल ही रोकेॅ पारेॅ
तारका के ताप लेली, कार्तिक कुमार छै॥28॥

अज्ञान तिमिर के मेटनिहार महादेव
जगत के जौने तीनो सूल के मिटाय छै।
जगत के गुरू शिव-शंकर त्रिशूल धारी
तीनो काल ज्ञाता सरवज्ञ कहलाय छै।
सब दुख टारै वाला सुख विस्तारै वाला
याचक के जौने मनोकामना पुराय छै।
तारक असुर सें व्यथित सब देवगण
महादेव के अपन दुखरा सुनाय छै॥29॥

तारक असुर सुरपुर के हड़पलक
आब तीनो लोक दिस ओकरोॅ नजर छै।
सब बल विफल जेकर भुजबल आगू
सब देव संग ही दुखित हरिहर छै।
तीनो लोक में अनीति सहजे पसरि गेल
सब दिस पसरल ठाम-ठाम डर छै।
कार्तिक कुमार के आदेश देॅ हे महादेव
सब देवता के भेल अब जान पर छै॥30॥