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अंगिका रामायण / दोसर सर्ग / भाग 4 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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कार्तिक कुमार के प्रताप से हरण होत
तारका के ताप, इहेॅ हमरा बुझाय छै।
जेना जेठ के रोॅ ताप बरखा के बुन्द हरै
पेड़-पौध-फूल-पात सब हरियाय छै।
वैसिना हरण होत देवता के पीर सब
जेना कि औषध सब दुख के नसाय छै।
तारका के त्रास सुनि क्रुद्ध भेल महादेव
शंभु तब कार्तिक के पौरूष बताय छै॥31॥

भयंकर युद्ध के भी उत्सव मानी शिव
कार्तिक कुमार के आदेश हुन्हीं देलकै।
पिता के आदेश मानी कार्तिक कुमार तब
भार सेनापतित्व के सिर धरि लेलकै।
युद्ध के रोॅ भाँति-भाँति विधि तब महादेव
बेर-बेर कार्तिक कुमार के बतैलकै।
सब अस्त्र-शस्त्र लेॅ केॅ कार्तिक तैयार भेला
देवगण सब मिली जय-जय गैलकै॥32॥

सब देव गेल स्वर्गलोक के रोॅ द्वार पर
आगू बढ़ै नामें सब देवता ठहरलै।
एक दोसरा के ऊ अगारी चलै लेल कहै
आगू दिश कोनो एक डेग भी न बढ़लै।
सब देव कार्तिक कुमार के रोॅ मुँह देखै
तारका के डर फेरो माथ पर चढ़लै।
देवता के हौसला बढ़ावी शुभ बात कही
कार्तिक कुमार अपने से आगू बढ़लै॥33॥

आगू जब बढ़ला, देखलका नन्दन वन
तारका असुर हाथें सगरो उजरलोॅ।
ओकरा से आगू अमरावती के पास आवि
देखलन वहाँ के भी रौनक बिगरलोॅ।
तब अमरावती के अंदर प्रवेश भेला
जहाँ छल भाँति-भाँति के रतन जरलाँ
अंदर के हाल देखि, देवता दुखित भेल
ठाम-ठाम के लगल सब शोभा हरलोॅ॥34॥

अमरावती के सब शोभा निरमूल लागै
धूल-पात लागल पथार जकाँ परलोॅ।
स्फटिक मणि से मढ़ल जे दीवार रहै
देव सिनी देखलक सब क उजरलोॅ।
देव सरोवर के रोॅ जरि जल सब
वन-बाग सब के रोॅ फूल-पात झड़लोॅ।
शयन भवन के रोॅ हाल बदहाल भेल
मकड़ी के जाल झोल चारो दिश भरलोॅ॥35॥

कार्तिक कुमार के रोॅ गला से लगल इन्द्र
धन्य-धन्य भेल निज नयन जुरैलकै।
ब्रह्मदेव कार्तिक के देखि क प्रसन्न भेल
मुख चुमि-चुमि निज गोद में बिठैलकै।
सब देवगण एक स्वर में ‘विजय भव-
कार्तिक कुमार“ कहि-कहि दोहरैलकै।
कार्तिक के गला मिली देव ऋषि नारद जी
करि जै जै कार झूमि-झुमि यश गैलकै॥36॥

कार्तिक कुमार तब करलन स्वस्ति पाठ
निज पुरवज के रोॅ आवाहन कैलका।
कश्यप ऋषि के हाथ जोरी क प्रणाम करि
अदिति समेत तिनपेखन करलका।
कश्यप अदिति के आशिष पावि क कुमार
तब आवी शची के प्रणाम हुन्हीं कैलका।
सब से आशीष पावी कार्तिक कुमार तब
सेना के पतित्व भार माथ पर धैलका॥37॥

दायित्व ग्रहण घड़ीजुमलै जगत पिता
आशिर-वचन कार्तिकेय केॅ सुनैलकै।
फेरो प्रकृति के छठा अंश से जगत पिता
दिव्य रूप वाली एक ‘बाला’ निरमैलकै।
प्रकृति के छठा अंश से जे उतपति भेल
इहेॅ लेली उनकर छठी नाम धैलकै।
सब देव मिली ई अलौकिक स्वरूप देखी
जगत पिता के सब असतुति गैलकै॥38॥

अमरावती उमंग आनन्द से भरि गेल
सब देव मिली क विचार तब कैलकै।
हरखित ब्रह्म देव ‘छठी’ के रोॅ हाथ लेॅ केॅ
कार्तिक कुमार के रोॅ हाथ में थमैलकै।
भेल जयमाल, पाणिग्रहण उछाह तब
सब देववधु सुमंगल गीत गैलकै।
सेनापति कार्तिक कुमार के रोॅ संग लेॅ केॅ
”छठी“ के रोॅ नाम देवसेना सब धैलकै॥39॥

कार्तिक कुमार के रोॅ रथ के सजैलोॅ गेल
रथ पर सोनाके रोॅ छतरी लगैलका।
सब से शौभाग्यशाली जित्वर नामक रथ
जेकरा में वेगवान अस्व जुतवैलका।
कार्तिक कुमार के सहायक देव सब
रथ पर देवसेना छठी के बिठैलका।
सब देव तारक असुर से लड़ै के लेली
अप्पन-अप्पन अस्त्र-शस्त्र सोरियैलका॥40॥

दोहा -

सजेॅ लगलहर ठाम पर, रथ सैनिक हथियार।
चारो दिश गूँजे लगल, जय-जयकार कुमार॥7॥