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अंगिका रामायण / दोसर सर्ग / भाग 7 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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अपने जलैलोॅ होलॉे आग में तारका फँसी
सेना के ऊ रूख विपरित करि लेलकै।
फेरो अग्निवाण के रोॅ पीछे से वायग्य वाण
तारक असुर तब हानी क चलैलकै।
तेकरा ऊपर तब कार्तिक वारूण्य वाण
मारी क अगिन के रोॅ ताप हरि लेलकै।
तारका के छोड़ल वायव्य वाण के प्रभाव
उनचासो मरूत नकाम करि देलकै॥61॥

दोनो सेना फेरू एक दोसरा पे टूटि गेल
कोन छोट बड़ कुछ कहलो न जाय छै।
दोनो दिश से चलल भयंकर वाण जब
वाण के प्रहार से आकाश पटि जाय छै।
वाण आसमान में पसरि गेल मेघ सन
तिल भर कहीं भी आकाश न बुझाय छै।
घनघोर मेघ सन गरजि उठल नभ
भयंकर लागै जब वाण टकराय छै॥62॥

सोरठा -

चलल वाण पर वाण, अरू परवान चढ़ल असुर।
रण जनु दीप समान, मरल असुर कीड़ा जकाँ॥6॥

वाण के प्रहार सब निसफल भेल जब
तारका असुर तलवार धरि लेलकै।
तुरत टुटि परल कार्तिक कुमार पर
कार्तिक झपटि केॅ सुतारि भाला लेलकै।
कार्तिक कसी क जब भाला फेकि मारलन
लगतें तारका तलवार छोड़ी देलकै।
गिरते ही तारका के धरती कंपित भेल
देवता के मन हरखित करि देलकै॥63॥

चारो दिश जय-जयकार करै देव गण
कार्तिक कुमार पर फूल बरसैलकै।
इन्द्रदेव के समेत सब देवता मिली क
कार्तिक कुमार के रोॅ अस्तुति गैलकै।
तारका के वध होतेॅ सुरलोक मुक्त भेल
सुरपति फेरो इन्द्रदेव के बनैलकै।
फेरो तीनो लोक तब आनन्द उछाह मनै
कार्तिक कुमार जी के जय-जय गैलकै॥64॥

दोनो सेना फेरू एक दोसरा पे टूटि गेल
कोन छोट बड़ कुछ कहलो न जाय छै।
दोनो दिश से चलल भयंकर वाण जब
वाण के प्रहार से आकाश पटि जाय छै।
वाण आसमान में पसरि गेल मेघ सन
तिल भर कहीं भी आकाश न बुझाय छै।
घनघोर मेघ सन गरजि उठल नभ
भयंकर लागै जब वाण टकराय छै॥65॥

सोरठा -

चलल वाण पर वाण, अरू परवान चढ़ल असुर।
रण जनु दीप समान, मरल असुर कीड़ा जकाँ॥6॥

वाण के प्रहार सब निसफल भेल जब
तारका असुर तलवार धरि लेलकै।
तुरत टुटि परल कार्तिक कुमार पर
कार्तिक झपटि कें सुतारि भाला लेलकै।
कार्तिक कसी क जब भाला फेकि मारलन
लगतें तारका तलवार छोड़ी देलकै।
गिरते ही तारका के धरती कंपित भेल
देवता के मन हरखित करि देलकै॥66॥

चारो दिश जय-जयकार करै देव गण
कार्तिक कुमार पर फूल बरसैलकै।
इन्द्रदेव के समेत सब देवता मिली क
कार्तिक कुमार के रोॅ अस्तुति गैलके।
तारका के वध होतेॅ सुरलोक मुक्त भेल
सुरपति फेरो इन्द्रदेव के बनैलकै।
फेरो तीनो लोक तब आनन्द उछाह मनै
कार्तिक कुमार जी के जय-जय गैलकै॥67॥

कार्तिक कुमार जी के संग छठी-देवसेना
घरे-घर अब अंग देश में पुजाय छै।
कार्तिक के शुक्ल पक्ष खषठी तिथि क व्रती
छठी के पूजी क मनोकामना पुराय छै।
उनकर सब मनोकामना पूरन हुऐ
जौने-जौने कार्तिक महातम के गाय छै।
कार्तिक के मूरत के हिय तमें सहेजी राखै
एकरा से आसुरी विचार मरी जाय छै॥68॥