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अंगिका रामायण / पाँचवा सर्ग / भाग 10 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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राम जी चाहलका भरत दिश गोल करेॅ
भरत सहजता से गोल हुए देलका।
राम जी के इच्छा के विरूद्ध न हुऐ छै कुछ
भरत जी तब शत्रुघन के बतैलका।
राम के लगल लात ठौर न मिल कहीं
भटकि भुवन थीर कहीं भी न पैलका।
सब देखलक गेन्द राम के चरण पास
ई रहस्य बस भरते ही बूझि पैलका॥91॥

भेल उपनयन, अध्यन के सुजोग भेल
गुरू घर आवी केॅ समस्त ज्ञान पैलका।
कुछ काल में ही राम चारो वेद जानी गेल
चारो भाई गुण-ज्ञान-शीस-यश पैलका।
अजबे लुभौना रूप लागै धनुधारी राम
जौने रूप जीव-जर सब के लुभैलका।
अवध के नर-नारी-बालक-बिरिध सब
प्राण से बढ़ि केॅ राम जी के अपनैलका॥92॥

वेद अेॅ पुराण राम सुनै अेॅ सुनावै नित
राम के रोॅ मन के संदेह के मिटाय छै।
भोर-भोर उठि माता-पिता के चरण छुऐ
नित उठि चारो भ्राता गुरू गृह जाय छै।
नगर निवासी के भी नीति सिखलावै राम
राम के चरित्र देखि सब हरसाय छै।
शीलवंत रामचन्द्र जब से किशोर भेल
दशरथ नियम सामाजिक सिखाय छै॥93॥

दोहा -

मुद्गल नैथ्तक ज्ञान बिन, बनै न सभ्य समाज।
चरित धर्म निवहै जहाँ, वहेॅ सुदेश-सुराज॥13॥

राम भेल युवा कोनो दिन युवराज होत
राजा दशरथ कुल गुरू के बतैलका।
राज-काज देखै लेली राजकीय ज्ञान चाही
राम राज्य के रोॅ भावी योजना बतैलका।
राजा के विचार से गुरूजी सहमत भेला
तुरते वशिष्ट रामचन्द्र के बोलैलका।
राजनीति के रोॅ ज्ञान परम जरूरी बुझि
गुरू राम जी के राजधरम पढ़ैलका॥94॥

राज्य के रोॅ हिय छिक ‘धरम’, ‘अरथ’ पग
राज्य के रोॅ वाहु ‘सैन्य-बल’ कहलाय छै।
मस्तक ‘ज्ञान’ छिक, मुख ‘संविधान’ छिक
‘गुप्तचर’ नयन जे सगरो सुझाय छै।
राज्य के रोॅ प्राण तत्व ‘राज्य के रोॅ नीति छिक
नीति बिना राज्य अराजक बनि जाय छै।
राज्य के ‘वाणिज्य’ नश-नश में फिरैत लहू
धरकि केॅ राज्य के जिवंत ऊ बनाय छै॥95॥

धरम आश्रत राज के तोहेॅ सुराज जानोॅ
जहाँ माता-पिता-गुरू पावै सदा मान छै।
घरे-घर जहाँ नित्य हवन-पूजन हुऐ
बाल बृद्ध सब करै हरि गुण गान छै।
देवता-पितर-गुरू-बाभन-बिरिध-वैद्य
सब जन पावै जौने राज्य में सम्मान छै।
मंत्र के रोॅ ज्ञाता, निरमाता छै पूजित जहाँ
दुनियाँ में वहेॅ देश सब से महान छै॥96॥

देश में पुजावै के रोॅ योग्य छै गृहस्थ-संत
धरती के कोरी जौने अन्न उपजावै छै।
एहनोॅ भू-स्वाम सिनी पूजै के रोॅ जोग छिक
जौने कि जमीन देॅ के नगर बसावै छै।
पूजै के रोॅ जोग छिक वनिक-धनिक जौने
विपत के वेर सब के रोॅ काम आवै छै।
पूज्यनीय ठामेठाम पेड़ के लगावै वाला
बंजर के कोरी उपजाउ जे बनावै छै॥97॥

सब मिली पूजै जहाँ देश के पहरूआ के
जेकरा ऊपर पूरे देश के रोॅ मान छै।
घरे-घर पूजित छै ध्वज अ प्रतीक चिन्ह
जेकरा बलें कि देश बनलोॅ महान छै।
माता के समान जहाँ पूजै मानचित्र लोग
संविधान देश के प्रतक्ष भगवान छै।
पूजित छै देश वहेॅ जगत गुरू के नामेॅ
उनकर किरती जगत करै गान छै॥98॥

दोहा -

सब विधि पूजन जोग छै, जे सिरजै नव छन्द।
पाय प्रजापति पद करै, सब जग परमानन्द॥14॥

जग में पूजित सब चित्रकार-मूर्तिकार
ईश्वर के जौने कि आकार बतलाय छै।
सरस्वती के रोॅ पूत पूजित कलमकार
जौने सभ्यता अेॅ संस्कृति सिखलाय छै।
रंग-करमी अेॅ रंगधरमी पूजित सब
स्वांग करि जौने दरपन दिखलाय छै।
पूजित छै सब विधि स्वर के साधक यहाँ
जौने स्वर ब्रह्म के रोॅ दरस कराय छै॥99॥

अति पूज्यनीय जौने पंथ निरमान करै
ज्ञान आरो भगति के धार जे बहावै छै।
सगरो पूजित सद पुरूष एर्स्यवान
जौने कि धरम के रोॅ ध्वज फहरावै छै।
पूजित छै वैद्य-गुरू-संत-कुलपुरोहित
जौने स्वस्थ समाजिक सब के बनावै छै।
पूजित छै सब दिश नीति के रचनिहार
जग में जे धरम के अलख जगावै छै॥100॥