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अंगिका रामायण / पाँचवा सर्ग / भाग 12 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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शास्त्र अनुरूप जे न शस्त्र के धारण करै
ओहनोॅ पुरूष शूर-वीर न कहावै छै।
जौने शस्त्रधारी सदाचार न पालन करै
ओहनोॅ तपाकी नर दुरगति पावै छै।
वहेॅ शस्त्रधारी नर सब जग पूजित छै
जौने कोनो प्राणी के संकट से बचावै छै।
शस्त्र के रोॅ बल से उपद्रव मचावै वाला
कोनो विधि शस्त्र से ही मिरतू के पावै छै॥111॥

धरम कही केॅ जे अधरम के युद्ध करै
सब विधि फल ऊ अधरम के पावै छै।
कोनो विधि करै छै मदद जे अधरमी के
संत-गुणवन्त भी अधरमी कहावै छै।
जौने कि धरम के विरूद्ध आचरण करै
तौने महापापी व्यविचारी कहलावै छै।
राजा ऊ अधरमी, जे राज सुख भोग लेली
जनता पे कर थौपी जन के पिड़ावै छै॥112॥

मूल निवासी के मिलेॅ राज्य के प्रधान पद
जौने राज्य के रोॅ हित राखि काज करतै।
देश निकाला के दण्डी बहुरि जोॅ देश आवेॅ
ध्यान रहेॅ कखनी ऊ कोन काज करतै।
नास्तिक जन से सदैव राजा दूर रहेॅ
ऊ प्रहार सहजेॅ धरम पर करतै।
जौने परमारथ से स्वारथ तरफ लानी
पहिने ऊ राजा के रोॅ संस्कार हरतै॥113॥

दोहा -

गोपनीयता राज्य के, जब तक भेल न भंग।
तब तक राजा इन्द्र सन, तब तक छत्र अभंग॥17॥

गोपनीय बात पत्नी से भी गुणुत रहेॅ
राज्य के सुरक्षा लेली यहू बात खास छै।
खरच से आमद सदैव बरियार रहेॅ
जानी लॅे कि वही ठाम लछमी के बास छै।
कारापाल-दण्डपाल-दुर्गपाल-वनपाल
धर्मपाल-लोकपाल में बसै विश्वास छै।
सेनापति-द्वारपाल-कोषपाल-धनपाल
जहाँ खुशहाल तहाँ राज्य के विकास छै॥114॥

लक्ष के भी बड़ा तोॅ विचार के भी बड़ा राखोॅ
चाहत भी बड़ा उद्गार बड़ा राखिहोॅ।
दिल के भी बड़ा तोॅ दिमाग के भी बड़ा राखोॅ
संयम के रूपी हथियार बड़ा राखिहोॅ।
बड़ोॅ गुण-ज्ञान-मान, सब खान-पान बड़ोॅ
ठाम-ठाम संयत आचार बड़ा राखिहोॅ।
जनता के प्रति तों राखिहोॅ व्यवहार बड़ोॅ
भुलियो न कभी अहंकार बड़ा राखिहोॅ॥115॥

सवैया -

ज्ञान रॅ सिन्धु जहाँ रघुनाथ
भला तँह के अब सागर थाहै।
जानय जे सब वेद-पुराण अेॅ
बैठि गुरू सँग नेम निमाहै।
बाल स्वरूप बिलोकि वशिष्ट
प्रभो सुमरी निज भाग सराहै।
कैलक राम प्रणाम प्रफुल्लित
जे गुरूदेव से आशिष चाहै॥2॥

सोरठा -

रघुपति ज्ञान निधान, पाय ज्ञान घर दिश चलल।
चिदानन्द के ध्यान, नयन मूँदि कुलगुरू करै॥7॥

अंगिका रामायण (पाँचवाँ सर्ग)
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