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अंगिका रामायण / पाँचवा सर्ग / भाग 4 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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लीला रामचन्द्र जी के सादर भवानी सुनोॅ
एक माह के रोॅ जौने दिन निरमैलका।
परम आनन्द में विभोर भेल सब जन
लेकिन रहस्य कोनो समझी न पैलका।
हमहूँ भुसुण्डी संग धरलौं मनुज रूप
सब देव छेला कोनो भनक न पैलका।
जनम उछाह हम देखलौं नयन भर
मोहक स्वरूप बड़ी मन के लुभैलका॥31॥

रूप-शील-शोभा के रोॅ धाम प्रभु रामचन्द्र
जब प्रकटल दशरथ के भवन में।
सगरो सजल घर-आँगन-बाजार गलि
परम हुलास बसै सब के रोॅ मन में।
सगरो आनन्द बस परम मगन जन
आनन्द अवध के बसल कण-कण में।
सब नाचै-गावै-कूदै-उछलै-कुलेल करै
भरल परम सुख सब के जीवन में॥32॥

अबिर गुलाल लाल सब के रोॅ गाल लाल
सरयु के जल तत्काल लाल-लाल छै।
अवध-निवासी संग देवता-तहात नाचै
रंग-रंग विहग बैठल डाल-डाल छै।
द्वार पर नट-भाट नाची क बजैया गानै
पावी क अकूत धन सब मालामाल छै।
ऐंगना में सब धी-सवासिन सोहर गावै
परम मनोहर कौशल्या जी के लाल छै॥32॥

अवध में आवी भेल प्रकट मदन-वन
अवध में अनुपम छटा बिखरैलकै।
शिशु के दरस लेली जुमल बसन्त-ऋतु
चारो दिश गम-गम-गम-गम कैलकै।
फूल-फूल भेल सब लता-पात, बाड़ी-झाड़ी
फूल के बन्दनवार सगरो बन्हैलकै।
भाँति-भाँति नारी आवै फूल के सिंगार बान्ही
भाँति-भाँति फूल गूथी राम के पेन्हैलकै॥34॥

दोहा -

छह रितु पहुँचल एक दिन, सब नक्षत्र जुमि गेल
मानव के तन धारि केॅ, प्रभु के दरसन लेल॥4॥

पुरजन-परिजन-स्वजन-सेवकजन
जहाँ जौने रहै तौने तेन्हें उठि थैलकै।
खुलल खजाना नृप लुटवै अमोल-धन
देवगण अंवर से फूल बरसैलकै।
भाँति-भाँति हार गूथी मालिन दौड़ल ऐली
हरियर दुभरी-हरदि लौन लैलकै।
निहुछि-परछि क निरखि चारो ललना के
सब थी-सवासिन सोहर मिली गैलकै॥35॥

सब सखि झटकि कौशल्या के आँगन गेली
जहाँ आजु सुख के रोॅ सिन्धु लहराय छै।
जहाँ रामचन्द्र झूलै, खुशी के रोॅ बाग फूलै
आनन्द बरसी जहाँ नेह से भिंजाय छै।
जिनका कि वेद गावै, शारद न पार पावै
योगी नित ध्यावै वहेॅ पलना में आय छै।
नगर निवासी देह के सुधि बिसारि गेल
याचक लूटल धन फेर से लुटाय छै॥36॥

राजा दशरथ जी लुटावै अन-धन-सोना
तीनो रानी कंठा-हार-कंगना लुटावै छै।
याचक मनावै खुश रहेॅ सदा चारो लाल
जयकार सुनि तीनों माता मुसकायै छै।
जनम उछाह में बिसरि गेली दिन-रात
रात के भी दिन जकाँ जागि क बितावै छै।
जिनका नयन में बसल चारो सुकुमार
ऊ नयन तजि निन सहजें परावै छै॥37॥

आनन्द-आनन्द भेल अवध के कण-कण
आनन्द के ओर कुछ कहलोॅ न जाय छै।
खग के समूह सुमंगल गीत गान करै
घरे-घर पवन सुवास पहुँचाय छै।
सुखलोॅ नदी में श्रोत सहजे उतरि गेल
ठूठ पेर में भी नव पल्लव जनाय छै।
टप-टप-टप दूध सहजे टपकि गेल
ढेनु सन भेल सब विसखल गाय छै॥38॥

कहलन शिव एक आरो गोपनीय बात
हम काग भुसुण्डी मनुज रूप थैलियै।
जुमलौ अवध त दरस भेल राम जी के
वहीं पे बहुत काल विचरण कैलियै।
मनुज के रूप लेखें जानि न सकल कोनों
अवध के गलि-गलि खूब भरमैलियै।
भाँति-भाँति अवध में मंगल उछाह मनै
सब संग मिलि हम हरि गुण गैलियै॥39॥

दोहा -

काक भुसुण्डी काक तन, धरि नित आँगन जाय।
रामचन्द्र मुख देखि केॅ, अधिक-अधिक हरसाय॥5॥

हाथी-रथ-घोड़ा, सोना-चाँदी-हीरा, अंगवस्त्र
जेकरा जे भावै अवधेश दान कैलका।
सब तिरपित भेल आशिर-वचन कहि
राजा सब याचक के कामना पुरैलका।
तब नामकरण के समय विचारी राजा
सादर स प्रेम कुलगुरू के बुलैलका।
बोलल वशिष्ठ मुनि हरि के हजार नाम
ताहि नाम में से एक राम नाम धैलका॥40॥