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अंगिका रामायण / पाँचवा सर्ग / भाग 6 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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शिशु के स्वरूप देखि डरली कौशल्या माता
जगत पिता के जौने पुत्र जकाँ जानली।
मुख में न तब असतुति के शब्द आवै
पुत्रमोह मिटल छुटल भ्रम जागली।
कखनों न व्यापेॅ हमरा भिर तोहर माया
हाथ जोरी हरि से कौशल्या कहॅे लागली।
हरि प्रेरणा से माता बात के गुपुत राखि
फेरो पुत्र जकाँ व्यवहार करेॅ लागली॥51॥

घुरकि-घुरकि जब चलै राम-लक्षमण
समुचे वदन तब धूल लेधराय छै।
कखनों दीवार के सहारा धरि ठार भेल
छोड़ी केॅ चलै लेॅ चहै खसि-खसि जाय छै।
तोतरैलोॅ बोल तब सहद से मीठ लायै
सुनि-सुनि माता मनेमन मुसकाय छै।
कखनों तेॅ सोंधी माँटी बूझी केॅ मूहोॅ में राखै
कखनों माटी माता के मुँह में बढ़ाय छे॥52॥

ठुमकि-ठुमकि पग धरै जब रामचन्द्र
झुनुक-झुनुक-झुन बाजल पैजनियाँ।
अँगना में हाँसै-खेलै-कुहकै-कुलेल करै
देखि केॅ मगन मन भरै तीनो रनियाँ।
गला में सुहावै भाँति-भाँति मोति के रोॅ माल
तिक ललाट अरू सोहै करधनियाँ।
माता जो बुलावै त दौड़ल चलि आवै चारो
सुनि केॅ कौशल्या जी के मोहक बचनियाँ॥53॥

दोहा -

अजगुत लागै राम के, मोहक बाल स्वरूप।
संत करै त्राटक जकाँ, टुक-टुक ताकै भूप॥7॥

घुंघरू झनकि रूनझुन-झनझुन बाजै
देखि-देखि माता मनेमन मुसकाय छै।
माता कोर आवै जब दौड़ल-दोड़ल राम
निज परछाही देखि खुद डरि जाय छै।
गिरल-उठल फेरो चलल ओनाहीं राम
बाल सुकुमार रूप सब के लुभाय छै।
रूप अनमोल लागै, तोतरौलोॅ बोल लागै
आनन्द अपार राजा दशरथ पाय छै॥54॥

साँवला-सलौना रूप ऐंगना में खेलै तब
माता कौशल्या हरसि गोदी में उठैलकी।
बेर-बेर हरि मुख निरखि-निरखि चूमै
अँचरा में ढाँकी पय पान ऊ करैलकी।
बाँहोॅ केरोॅ हार हरि माता के गला में डाली
मुख परसल तब जननी ठठैलकी।
लटकल लट देखि शिशु के ललाट पर
माता सहियारलकी सिर सहलैलकी॥55॥

रामचन्द्र जी के संग-संग लक्षमण रहै
भरत के संग रिपुसुदन कुमार छै।
श्याम रंग राम आरो भरत कुमार लागै
गौर वर्ण लखन सत्रुधन कुमार छै।
कखनों भरत लागै रामचन्द्र जी जेहन
शत्रुधन लागै जेना लखन कुमार छै।
एक बेर जौने बालरूप के दरस करै
नयन तृषित भेल जिन्दगी साकार छै॥56॥

देवगण आवै जब मानव के रूप धरि
देखि-देखि बालक के मन हरसाय छै।
एक बेर जौने रामचन्द्र के दरस पावै
उनकर चित्त अवधे में बसी जाय छै।
जौने सुमिरण करै वाल रूप राम जी के
उनकर मन के रोॅ कामना नसाय छै।
जिनकर चित्त वाल रूप राम से लगल
शिव सन उनका समाधि लगि जाय छै॥57॥

ऐंगन कौशल्या जी के मान सरोवर लागै
चारो शिशु हंस नाखि करै विचरण छै।
खनु लागै धरती पे प्रकट मयंक भेल
नयन चकोर जे निहारतें मगन छै।
ऐंगना में राम जी लुटावै छै आनन्द-निधि
लूटै सब देवता आनन्द रूपी धन छै।
भजत विजेता बाल रूप रामचन्द्र जी के
दोनों कर जोटि नित करैत वन्दन छै॥58॥

दोहा -

बाल स्वरूप निहारते, थकल न तनियों नैन।
मन हरखित होतें रहल, सुनि-सुनि हरि के बैन॥8॥

माता रामचन्द्र जी के हिय से लगैने छेली
चुल्हा पे चढ़ल दूध तखनें उफनलै।
राखि क बालक माता चुल्हा के करीब गेली
फेरो से गोदी के लेली राम जी मचलतै।
सुनतें रूदन माता तुरते पलटि गेली
अँचरा में तब क्षीर-सागर उमरलै।
अँचरा के दूध के प्रथम माता शान्त करि
प्रेम बस चुल्हा के रोॅ दूध के बिसरलै॥59॥

माखन के स्वाद में भुलैलोॅ होलोॅ रामचन्द्र
चूक बस मटका सहजें ओंघरैलका।
मटका में डाली हाथ मुँह से लगैलकाथ
आनन्द मगन जँह-तँह लेधरैलका।
परतें नजर जब दौड़ली कौशल्या माता
माता के तरफ राम नजर घुमैलका।
अपना के राम निरदास बतलावै लेली
जुमतें कौशल्या जी के कानी केॅ देखैलका॥60॥