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अंगिका रामायण / पाँचवा सर्ग / भाग 9 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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हरेक ब्रह्माण्ड में अनेक रूप देखलन
देखलन भाँति-भाँति जिनिस अनेक छै।
हरेक ब्रह्माण्ड बीच एकक अवधपुरी
हरेक अवध बीच सरयू भी एक छै।
अवधे-अवध दशरथ अेॅ कौशल्या माता
भरत-लखन-रिपुसूदन एकक छै।
सब ठाम सब कुछ दिखल अलग किन्तु
देखलन, राम जी हरेक ठाम एक छै॥81॥

बहेॅ रंग बालपन सहज स्वभाव आरू
रूप रंग सब कुछ एक रंग पैलका।
अनेक ब्रह्माण्ड में भटकला भुसुण्डी बाबा
फिरैत-फिरैत सत्-कलप बितैलका।
सगरो भटकि निज कुटिया में आवि गेल
आरो कुछ काल निज कुटी में बितैलका।
तहाँ देखलन फेरो राम के जनम भेल
जनम उछाह फेरो आवि केॅ मनैलका॥82॥़

राम जी के उदर में देखि केॅ अनेक युग
व्यापक अनन्त जग, चेतना बिँकसलै।
मन आरो बुद्धि जौने मोहित भ्रमित रहै
सब मोह-भ्रम तब सहजें निकसलै।
फेरो से भुसुण्डी बाल रूप के सुमरलन
एतने में तब रघुनाथ जी बिहँसलै।
राम जी के मुख से भुसुण्डी जी बाहर भेल
तखने से उनकर जीवन सरसलै॥83॥

सोरठा -

अजब लुभौना राम, जे भरमावै संत के।
रूप सिन्धु-सुख-धाम, बहुरि बसै संतन हिय॥6॥

फेरो से देखलकाथ ओहने लड़कपन
ओनाहीं हँसी-बोली केॅ फेरो से लुभैलका।
राम के विराट रूप याद करि केॅ भुसुण्डी
भाँति-भाँति मुनि दुरलभ सुख पैलका।
तखने कौशल्या माता घर से बहार भेली
माता कहि रामचन्द्र उनका बोलैलका।
तुरते कौशल्या जी के गोदी में चहरि गेला
अँचरा में छिप केॅ पियूष पान कैलका॥84॥

एक दिन हनुमंत लाल महादेव संग
ऐला प्रभु राम जी के दरसन पाय लेॅ।
शिव जी मदारी भेला कपि हनुमंत लाल
जुमला मदारी के रोॅ खेल दिखलाय लेॅ।
ठुमुकि-ठुमुकि तहाँ नाचै हनुमंतलाल
बेर-बेर प्रभु रामचन्द्र के रिझाय लेॅ।
जेना-जेना ठुमका लगावै हनुमंत लाल
कहै माता राम जी के नाची केॅ दिखाय लेॅ॥85॥

कौशल्या के ऐंगना में बितल बरस पाँच
बसल भुसुण्डी नील-गिरि पर आवी केॅ।
हम हे भवानी जी अवध में रहि गेलौं
अपनोॅ स्वरूप एक योगी के बनावी केॅ।
अवध के माटी में रमल मन एहनोॅ कि
एक छन भी न भेल मन कहीं जावै केॅ।
खेलै गेंद राम जी निहारौं कहीं दूर बैठी
बेर-बेर भागै छवि राम जी दिखावी केॅ॥86॥

सरयु के तीर-तीर, तीर अेॅ धनुष लेने
गेन्द उठलैतेॅ होलोॅ चारो लल्ला जाय छै।
सरयु किनारे चारो उछलै उछालै गेन्द
आपस में हाँसै-खेलै-बतियाय छै।
दौड़ै कभी भागै, बड़ी अजगुत लागै चारो
कभी महादेव जी सरीक बनी जाय छै।
तन के आभूषण बनल तब धूल-कण
रूप अब पहिने से अधिक सुहाय छै॥87॥

खेल के मैदान में उछालै गेन्द रामचन्द्र
भरत-लखन-रिपुसूदन बिहँसलै।
जिनकरा जौने दिश सुतरै, सुतारै तौने
दल में बँटल बिन खेल नेॅ सरसलै।
राम जी कहलका दू दल में बँटि केॅ खेलोॅ
राम के बचन सुनि लखन जी हँसलै।
बोलल लखन लेत राम से विरोध कौन
किनकर चित दुरमति आवि बसलै॥88॥

दोहा -

राम विरोधी जीव से, शंभु सदा प्रतिकूल।
तिनकर सब-टा सुख नसै, बनै सूलेॅ सन फूल॥12॥

लखन के बात सुनि बोलल भरत लाल
राम के चाहत कभी बेरथ न जाय छै।
रामचन्द्र चाहल कि दल में बँटी केॅ खेलौं
भरत अपन दल अलग बनाय छै।
राम जी के संग भेल आवी क लखन लाल
शत्रुघन भरत के संग लगि जाय छै।
केतनों कसी केॅ गेन्द मारै छै लखन लाल
भरत हरेक गेन्द रोकी केॅ देखाय छै॥89॥

हारल खेलोॅ के भी जितावै वाला रामचन्द्र
सहजे भरत लाल चार गोल कैलका।
चारो गोल धरम-अरथ-काम-मोक्ष जकाँ
गोल करि भरत अपार सुख पैलका।
हार के विलोकी केॅ विदकला लखन लाल
गोल लेली राम जी के आगू करि देलका।
राम जी चलल जब गेन्द लेने गोल करेॅ
देखलका फोल राम गोल करि देलका॥90॥