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अंगिका रामायण / प्रथम सर्ग / भाग 4 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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नारद के सादर सम्मान करी हिमवंत
धिया के लानी क हस्तरेखा देखवैलकै।
देखी हस्त रेखा ऋषि भाग्य के बखान करै
पारवती के जगत पूजिता बतैलकै।
लिखलोॅ छै भाग्य में अमर अविनाशी पति
भाग्य के सराही क हजार यश गैलकै।
किन्तु एगो दोष जे बतावै छैई हस्ता रेखा
नारद ऊ दोष भी बिचारी क सुनैलकै॥31॥

लिखलोॅ छै गौरा के अमर अविनाशी पति
बिन घर-द्वार आरू बिन बाप-माय के।
रंग-रूप अशुभ, अशुभ भेष-भूषा धारी
रहै जे हमेशा तन भसम रमाय के।
वर के रोॅ दोष सुनी उठली चिहुँकि मैना
रहि गेली दाँत तले अगुँली दवाय के।
बेर-बेर मैना गुण-दोष के बिचार करै
दोषके बिचारी चित रहल डेराय केॅ॥32॥

वर के रोॅ दोष के बिचार करि मैना रानी
धिया के पकरि अंग से लगाय लेलकी।
बार-बार गिरजा के शिश सहलावै चूमै
उलीच क प्यार गोद में बिठाय लेलकी।
झूठ नेॅ हुए पारेॅ छै देवऋषि के रोॅ बात
अपना के मैना रानी समझाय लेलकी।
दोष के निवारण के हेतु तब मैना रानी
नारद से पुछी जुगती-उपाय लेलकी॥33॥

मैना के रोॅ दुख के निवारण करै के लेली
नारद कहलका कि एक बात मानियै।
जे भी दोष गौरा के रोॅ वर में गिनैलोॅ गेल
शिव में समान रूप सब दोष जानियै।
समरथवान शिव, सब गुण खान शिव
दोष के बिसारी सब गुण पहचानियै।
जोने विधि आबी पारवती से महेश मिलेॅ
हिबंत तौने उतजोग आब ठानियै॥34॥

दोष जों देखै लेॅ चाहोॅ सब में छै दोष, सुनोॅ-
विष्णु के बिचारोॅ त सयन शेष नाग छै।
ब्रह्म के बिचारोॅ जे जगत में अपूज्य भेल
देखोॅ तोॅ सुरूज के रोॅ रोम-रोम आग छै।
सुन्दर स्वरूप के रोॅ उपमा में चाँद बसै
चाँद के निहारोॅ देखोॅ ओकरो में दाग छै।
वैसी ना तोॅ जानोॅ शिव परम कल्याणकारी
औघड़-मशानी शिव अंग-अंग नाग छै॥35॥

दोहा -

गुण दोषोॅ से छै परे, महादेव निसकाम।
जग हित में जे विष चखै, शिव शंकर सुखधाम॥5॥

वर के रोॅ दोष जब नारद गिनैलका त
पारवती मनेमन सुनी क बिहँसलै।
अशुभ अमंगल अकामी अविनाशी शिव
क्षण में ही आवी गिरजा हिय में बसलै।
मैना-हिमवंत दोनों सुनते उदास भेल
जेना कोनो ग्रह आवी दोनों के गरसलै।
नारद के एक क्षण शिव जी के ध्यान भेल
अशुभ अमंगल स्वरूप लखी हँसलै॥36॥

बार-बार नारद कहै कि हिमवंत सुनोॅ
गौरा तप करती महेश वर पाय लेॅ।
लिखलोॅ छै भाग में अशुभ भेष धारी पति
शिव के सुमरि सब मंगल बनाय लेॅ।
सब शुभ समदी क नारद चलल गेला
मैना रानी गेली पतिदेव के बुझाय लेॅ।
गौर के विवाह हम करब सुयोग्य वर
जुगती करब हम सुन्दर जमाय लेॅ॥37॥

शिव के मनोॅ में धारी, तब गिरजा कुमारी
मरम विचारी ऐली तप हेतु वन में।
शिव पति लागी, भेली शिव अनुरागी अब
ऐली सुख त्यागी, शिव नेह राखी मन में।
कंद-मूल के अहार, कभी अन-जल वारि
कभी बेलपात खाय, सयन भुवन में।
करय विचार ब्रह्म, गौरी अति सुकुमरि
चाहै महादेव भरतार हर तन में॥38॥

जगत कल्याणकारी शिव के रिझावै लेली
पारवती तपसी के रूप धरी लेलकी।
शिव-शिव जपि, शिव शंकर के ध्यान करि
कंद मूल खाय क कठोर तप कैलकी।
पारवती के कठोर तप सुनलकि मैना
धिया के निहोरलकि बहुत मनैलकी।
हीत-मीत सब कहै तप निसतारै लेली
केकरो कहल गौरी कान में धैलकी॥39॥

जहिया से महासती तजलकि देह निज
शिव निज मन में विराग लेने भटकै।
सहज अकाम शिव जपै नित राम नाम
घूमै ठाम-ठाम कहीं एक ठाँ न अटकै।
राम नाम वाँचै शिव झूमि-झूमि नाचै आरू
देव देखी भागै जब शिव लट पटकै।
तब ऐला प्रभु राम, शंकर अकाम जहाँ
प्रीत परिणाम बूझि जप से न हँटकै॥40॥

दोहा -

राम सदा चित में बसै, करै संत सब ध्यान।
सुमरै तब बाहर दिखै, बहुरै अंयान॥6॥