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अंगिका रामायण / प्रथम सर्ग / भाग 5 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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राम नाम सुमरैत राम जी प्रकट भेला
राम के दरस से माहेश्वर हरसलै।
अपना के धन्य-धन्य कहि उठला महेश
राम जी के नेह अमरित जे बरसलै।
बार-बार शिव जी के जप से सराही राम
परवती तप के सराही क विहँसलै।
सती पारवती भेली हिमगिरी घर जाय
फेरो उनका हिय महेश जाय बसल॥41॥

एक बार हाथ जोरी माँगऊ महादेव कि
अपनोॅ वियाह नाथ हमरा देखाय देॅ।
अपनोॅ आँखी से हम तोहरोॅ वियाह देखौं
महादेव हमरोॅ नयन के जुराय देॅ।
फेरो पारवती तप करय महेश लेली
जाय पावती के मनोरथ पुराय देॅ।
जगत में तप के मिटेॅ न मरजाद शिव
शंकर असंभव के संभव बनाय देॅ॥42॥

राम के कहल शिव भक्तिबश शीश धरि
बिन कुछ सोचने स्वीकार करि लेलका।
पारवती प्रेम के परीक्षा लेली महादेव
मंगल विचारी सप्त ऋषि के भेजलका।
सप्तऋषि नारद के कपटी भिखारी कही
शिव जी के औघड़ कपाली बतलैलका।
पारवती प्रेम के परीक्षा लेली सप्तऋषि
विष्णु में हजार गुण उनका गिनैलका॥43॥

अपनोॅ परन पर रहली अडिग गौरी
सप्तऋषि के कहल कान में न धैलकी।
गुरू के रोॅ निन्दा जकाँ, नारद के निन्दा सुनि
परवती दोनो कान बंद करी लेलकी।
शिव के रोॅ निन्दा जब सुनलकि पारवती
दक्ष के हवाले से आगाह करी देलकी।
शिव अपमान के प्रमाण जानोॅ सप्तऋषि
पारवती नयन में रोष भरी लेलकी॥44॥

सप्तऋषि लौटला त देवता विचार करै
जुगत निकालै केना शिव व्याह करतै।
शिव के विवाह के न बनत सुयोग तब
कोन विधि तारक-असुर केना मरतै।
सब देवता मिली क एक परपंच रचै
शिव केना राम तजि काम दिश बढ़तै
कोन विधि टुटत समाधि महादेव जी के
कोन विधि पारवती शिव जी के वरतै॥45॥

दोहे -

सब जग नचवै काम छै, नाचै सकल समाज।
जे हिय में नै राम छै, तहाँ काम के राज॥7॥

जिनका बेथै काम छै, चित से उतरै राम।
राम दुरैते जानि लेॅ, भेल विधाता वाम॥8॥

कामदेव छिक इन्द्र के, एक अचुक हथियार।
वज्र विफल जैजाँ हुऐ, तैजाँ करै प्रहार॥9॥

शिव के तपस्या भंग करै लेली देवगण
परपंच रचि क मदन के भेजलकै।
मदन के पीछू-पीछू बसन्त पहुँचि गेल
चारो दिश मह-मह-मह-मह कैलकै।
कामिनी के भौंह के समान रूपवान धनु
कुसुम के वाण तब मदन उठैलकै।
देखि रति-पति के बिहँसि गेल वन-वाग
भँवर कलि के रोॅ अधर पान कैलकै॥46॥

देवराज के रोॅ ई अकाट्य अस्त्र कामदेव
सुरपति जेकरा देखी गरव कैलकै।
कामदेव पुछलक-कोन छै पुरूष जौने
जगत में कठिन कठोर तप कैलकै?
करि क कठोर तप सरग के चाह करै
इन्द्र के सिंहासन के जौने कि हिलैलकै।
या कि कोनो रूपवती दृढ़ पतिव्रत नारी
देवराज इन्द्र के चाहत ठुकरैलकै॥47॥

काम के रोॅ वेग छिक बाढ़ के रोॅ धार जकाँ
धरम-अरथ दोनो कूल के नसाय छै।
काम के रोॅ वाण जेकरा भी एक बार लगै
चीर काल तक तौने उबरेॅ न पाय छै।
काम के रोॅ बीख पोर-पोर में प्रदेश करै
सब से प्रथम सब लाज मरि जाय छै।
नारी चित पुरूष, पुरूष चित नारी बसै
एक दोसरा के देखि-देखि ललचाय छै॥48॥

कहलक कामदेव देखि क बसन्त के रोॅ
हमरा समान यहाँ कोन धनुधारी छै।
हमरों कुसुम बाण सन वाण आन कहाँ?
फूल के रोॅ वाण ई पिनाक पर भारी छै।
हमरोॅ गति के न रोकनिहार जगत में
हमरोॅ अधिन सब पुरूष अेॅ नारी छै।
अबिलम्व हमरा आदेश करोॅ देवराज
कामदण्ड के बाताबोॅ कोन अधिकारी छै॥49॥

कहलन देवराज शिव के रोॅ नाम तब
सुनते ही मदन कपार धरि लेलकै।
शिव के रोॅ तप पूँज अनल समान लागै
तन सिहरल हथियार धरि देलकै।
तारका असुर के विनाश के जरूरी बूझी
अपनोॅ अहित अंगिकार करि लेलकै।
देवराज इन्द्र के आदेश मानी कामदेव
मनेमन मरन स्वीकार करि लेलकै॥50॥

सोरठा -

बनल काम निषकाम, चलल करै लेॅ होम तन।
चित में धरि के राम, परम स्वारथी देव गण॥3॥