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अंगिका रामायण / प्रथम सर्ग / भाग 7 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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मदन दहन पुनि काम के अनंग सुनी
देवता चलल शिव किरती सराहै ले।
ब्रह्मा आरू विष्णु के रोॅ साथ लेॅ केॅ देवगण
शिव पास ऐला निज नेह के निवाहै लेॅ।
सब बात कहि ब्रह्मा मूल बात पर ऐला
तप के सदैव मरजाद के निवाहै लेॅ।
कठिन कठोर तप गिरजा के देखी कहै
नाथ चलियै गिरिश नन्दनी वियाहै लेॅ॥61॥

दोहा -

शंभु करलका प्रेमबस, अपनों हठ परित्याग।
जग हित खातिर जोरलक, गिरजा से अनुराग॥10॥

देवता के नेह देखि शिव जी प्रसन्न भेल
प्रेम बस याचना स्वीकार करी लेलका।
शिव के स्वीकृति से प्रसन्न भेल देवगण
सब मिली योजना स्वीकार करी लेलका।
एक क्षण महादेव गिरजा के ध्यान करी
मनेमन फेरू अंगिकार करी लेलका।
सब के रोॅ एक मत देखी क महेश योगी
हठ तजि त्याह के बिचार करी लेलका॥62॥

ब्रह्मदेव देव संग, संग-संग सप्तऋषि
सब मिली-जुली पारवती के मनैलकै।
शिव गेल काम जारी, सुनोॅ गिरिजा कुमारी
मदन दहन के रोॅ खबर सुनैलकै।
सप्तऋषि शिव के रोॅ कोप के बखान करै
फेरो रति क्रन्दन के हाल बतलैलकै।
शिव अब भेल निसकाम सुनोॅ पारवती
त्रिभुवन पति अब काम के लरैलकै॥63॥

पारवती बोलली कि सुनोॅ सिद्ध सप्तऋषि
शिव से निपट अनजान तों बुझाय छेॅ।
जगत बिदित शिव महा निसकामी योगी
उनका तो कामी आरो जगती बताय छेॅ।
शिव के तों जानोॅशिव जग के अधार छिक
शिव प्राण तत्व छिक जिनका तों गाय छेॅ।
शिव बिन शव, जहाँ शिव तहाँ सब जानोॅ
शिव के मरम तोहें समझी न पाय छेॅ॥64॥

हम छी श्रद्धा त शिव हमरोॅ विश्वास छिक
हमरा से शिव कभी अलग न भेल छै।
हम छी प्रकृति शिव परम पुरूष छिक
दोनो के रोॅ जनम-जनम के रोॅ मेल छै।
मिलन-जुदाई, जप-तप, हठ, जोग-भोग
मदन-दहन, नटराज के रोॅ खेल छै।
भनत विजेता पारवती के रोॅ बात सुनी
सब ऋषि देव नतमसतक भेल छै॥65॥

तोहेॅ जे कहै छेॅ ऋषि, शिव काम जारी गेल
काम शिव के समीप आवी खुद जरलै।
आगिन के दाहक स्वभाव छिक सहजहि
आगिन में पैसी क कहाँ कोनो उबरलै।
जोग के रोॅ ताप से जरै छै भोग सहजहिं
जल में लवा के स्वरूप जेना हरलै।
मदन दहन के न दोष शिव पर डारोॅ
राम काम एक ठाम कहिया ठहरलै॥66॥

दोहा -

काम मोम समतूल छै, शंकर अनल समान।
आँच पाय छन में जरै, मिटै मूल पहचान॥11॥

शिव के वियाह के स्वीकृति तब सप्तऋषि
देव संग जाय हिमवंत के सुनैलकै।
अपनोॅ जतन, फेरो देव के प्रयास, आरू
मदन दहन के रोॅ बात बतलैलकै।
रति के बिलाप, शिव के रोॅ वरदान, आरू
मदन अनंग कथा बाँची क सुनैलके।
पारवती के तपस्या पूर्ण भेल जानी मैना
नगर में आनंद उछाह ऊ मनैलकै॥67॥

सुदिन सुघड़ि शुभ नक्षत्र बिचार करि
हिमगिरी वेद विधि लगन धरैलकै।
ऊ लगन-पत्र सप्तऋषि के सादर सौपि
हिमवंत दिन ब्रह्मदेव के पठैलकै।
लगन के पाति देखि देवता प्रसन्न भेल
एक दोसरा के बाँची-बाँची क सुनैलकै।
तब सुरलोक भरि मंगल पसरि गेल
सब दिशदेव सिनी शंख ध्वनि कैलकै॥68॥

व्याह लेली शंभु गण शिव के शृंगार करै
पहिने त भंग से विभोर करी देलकै।
फेरो सब मिली अंग-अंग में भभूत लेपि
माथ पर नाग के ही मौर धरि देलकै।
नाग ही के कुण्डल, अेॅनाग ही के काड़ा-छाड़ा
नाग ही के गला बीच हार धरि देलकै।
शिश पर गंग, अंग-अंग में भुजंग आरू
माथ पर दुतिया के चाँद जरी देलकै॥69॥

तन पर मृगछाल, गले मुण्डमाल सोहै
तीन-तीन नयन अशुभ वेशधारी छै।
कर में त्रिशूल संग डमरू बिराजै आरू
पग बिन पनही के वसहा सवारी छै।
सब करै उतपात, भूत-प्रेत के जमात
दुलहा बनल जे महेश-त्रिपुरारी छै।
डमरू पे डोलै गण, नाचै सगरो नगन
मगन महेश नाचै जग हितकारी छै॥70॥