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अंगिका रामायण / प्रथम सर्ग / भाग 9 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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बच्चा माता के धरी क घर के भीतर गेल
कहलक खिड़की-केबाड़ी बन्द करी ले।
कहलक हमरा पीछू त कोनो ऐलोॅ नेॅ छै
सब दिश देखि भगवान के सुमरी ले।
देवलकि माता कि अभी भी डर गेलोॅ नेॅ छै
कहलकि नुनु चित असथिर करी ले।
सकल सुरक्षा बसै माता के रोॅ अँचरा में
कहै पुचकारि नुनु अँचरा पकरी ले॥81॥

सोरठा -

अभय करै संसार, मुद्गल अंचरा माय के।
लै आँचल के आर, जहाँ कही भी भय दिखै॥5॥

बुतरू कहलकै कि माता ई बरात नै छै
देखवें त लागतौ कि जम के जमात छै।
भाँति-भाँति रूप वाला, भाँति-भाँति भेष वाला
भाँति-भाँति बोली बोलै करै उतपात छै।
कोनो-कोने सर हीन केकरो छै मूरी तीन
केकरो तों देखवें कि पीठ पर हाथ छै।
दुलहा के देखवें त दुलहो अजूबे लागै
भू-प्रेत बीच में अजीब भूत-नाथ छै॥82॥

नाँगटे धतिंग, बोलै इडिं़ग-बिड़िग सब
चारो दिश घेरी-घेरी भूतनी नचावै छै।
कोनो डमरू बजावै, कोनो अंट-संट गावै
कोनो-कोनो, कोबे-कोबे गरदा उड़ावै छै।
दौड़ै कोनो भागै, बड़ी भयंकर लागैसब
एक नासमझ दोसरा के समझावै छै।
कैने अशुभ शृंगार वर वसहा सवार
हर-हर गैने सब गाम दिश आवै छै॥83॥

ई बरात देखी क जिवित जौने रहि जैतै
गौरी दीदी के उहेॅ वियाह देखेॅ पारतै।
जेकरा कि अन्दर न पुण्य के प्रभाव होत
देखतें बरात यमलोक ऊ सिधारतै।
एहनोॅ वरात के दरस दुखदायी बड़ी
साहसी-धीरजवान धीरज के हारतै।
आवी रहलोॅ छै बरियात अब गाम दिश
आब त ई गाम के विधाता ही उबारतै॥84॥

ऐंगना में आबी सब खबर सुनावै, कहै-
केहनोॅ छै बर, अेॅ केहन बरियात छै।
केहनोॅ छै अद्भुत दुलहा के रूप रंग
भूत आरो प्रेत के केहन उतपात छै।
एक दिश रूपवान देवगण ऐलोॅ होलोॅ
एक दिश जटाधारी योगी के जमात छै।
अँचरा में शिशु के ढ़ाँकी क कहै एक नारी
अजब भयान लागै आज के रोॅ रात छै॥85

सवैया -

बैठि विचार करै हिमवंत कि
व्याह रचौ कि वरात के फेरौं!
छै सगरो भय के समराज्य त
चैन के साँस कहाँ हम हेरौं?
पूजब भूत अतिथि जकाँ या कि
भूत परेत के मारि खदेरौं!
नारद के कटु बात कहौं या कि
व्याह उछाह के जाय क एढौं॥1॥

नगर प्रवेश करलक बरिात जब
आबी जनवास देवता सिनी ठहरलै।
बिरिध-सयान सब दुलहा देखै लेॅ चाहै
वसहा से तखने महादेव उतरलै।
बैठि गेला महादेव देव के समूह बीच
भूत सिनी जाय, गली-गली में पसरलै।
यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ हर ओर भूत-भूत
भूत-भूत चारो दिश दहसत भरलै॥86॥

दुलहा मतंग लागै अजब धतिंग सन
राजा हिमवंत के पसन्द केना परलै!
दुलहा न चित जब चढ़ल सराती के त
देखि-देख देवता सिनी के मन डरलै।
भागै के रोॅ रसता तलाश करि राखै सब
कहीं जों सराती के रोॅ मगज बिगरलै।
केकरा ऊ मारी देतै केकरा दबारी देतै
देवगन करी अनुमान ई सिहरलै॥87॥

कंचन के थारी भरी आरती संवारी मैना
पुर के रोॅ नारी संग परछै ल जाय छै।
दुलहा के रूप लागै अजवे कुरूप सन
अंग में भुजंग नैन तीन-टा बुझाय छै।
जौने गीत गावे आवै, वर देखते परावै
सब मिली मैना के उलाहना सुनाय छै।
लागै विकराल गला लिपटल व्याल अरू
लोग हँसै मैना के रोॅ बुढ़वा जमाय छै॥88॥

सोरठा -

भागल सब-टा भूप, जे ऐलोॅ छल व्याह में।
अजब भयंकर रूप, गितहारिन भागेॅ लगल॥6॥

दुलहा के रूप रंग देखलकि मैना रानी
आरती के थरिया पटकि-झट-भागली।
ऐंगना में गेली आरो गिरली अचेत भेली
उठली त छाती पीटी-पीटी कानेॅ लागली।
वर बिकराल आरो अति सुकुमार धिया
मैना रानी नारद के गरियावेॅ लागली।
कानी-कानी मैना रानी फेरो से अचेत भेली
फेरो कानै कोसै ऊ अचेत से जे जागली॥89॥

फेरो कोसलकि विधि-विधाता के मैना रानी
परवती के ऐनोॅ स्वरूप जौने देलकै।
जनम जों राजा हिमवंत घर देलकै त
एहन भिखारी वर कियेॅ लिखि देलकै?
जब कि लिखल रहै एहने बौराह वर
तप के नारद उपदेश कियेॅ देलकै?
एहनोॅ कठिन तप करलकि गौरी धिया
ई कठोर तप के रोॅफल कहाँ पैलकै?॥90॥