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अंतस रा ऊंडोडा़ आखर / महेन्द्रसिंह सिसोदिया 'छायण'

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रड़की हैं-
ठेठ हेमाळे सूं ले
गहरौड़े उण समदर तांई
खागां हंदी सिंधु कड़ियां
भड़की हैं-
भुजबळ रै पांणां
रणचंडी हाथां ले खप्पर
नाची हैं-
काळी मतवाळी
मदमस्त करां धर किरपांणी
टाळी हैं-
जिकण आंधियां ऊजड़
सांप्रत भिड़नै सदियां तांई।

जठै गाईजी-
इमरत वाणी घण संतां री
जठै उड़ी ऊंची गिगनारां
धवळ पताका धरम-करम री।

जठै-
पोमचो पीळो परतख
साख भरै हैं
सतवंतिया री
जठै अजै तक-
मूमल नै मनवारे मैंदर
ढोला-मरवण मीठा-मधरा
हेत-प्रीत रा रंग रचै हैं
जठै अजै तक-
गूंजै रागां
रावणहत्था-अळगोजा री
जठै अजै तक-
नड़ मंजीरां झींझां ढपली
सुरणाई रा सुर साजे हैं|

जठै अजै तक-
काती रै खेतां में किरसा
भिणत तणा दूहा अरथावै
काछबियौ-राणलियौ गावै
तीज तिंवारा लाडा-कोडां
सकल सुरंगां रंग रचावै |

जद कैवूं कै-
समदर में सूखैला पांणी
ढह जासी आबू रा भाखर
गळ जासी हेमाळो एक'र
तो ई म्हारी थार धरा रौ
नीं सूखै
आंख्यां रौ पांणी
कीरत री बातां नीं जावै
गळै नहीं इतियासूं आखर।

क्यूं कै म्हारी-
अंतस री सतरंगी सांसां
काळ-दुकाळा सूं गुजरी हैं
घोर अभावां सूं जूंझी हैं
म्हारी इण झींणी झूंपडियां
मांडी हैं गरबीली गाथा
म्हारै इण खेजड़ियां-खींपां
जियाजूंण नै परतख जीवी
सैवण सुरंग बोरड़ी म्हारी
जाळ आकड़ा साथै न्यारा
रोहिड़ै रा फूल खिलाया।

जठै-
मिनख में मरजादां रा
ऊजळ मोती जगमग जागै
अंतस रा ऊण्डौड़ा आखर
नैह तणी नदियां छळकावै
धवळ धोरियां !
मीठा मगरा !
परघळ प्रीत जुगां सूं पौखे
यां नै बीर, संभाळ राखजै
अंतस मांय अंवेर राखजै |