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अकूम्बे-अकूम्बे म्हारो घर भरियो जी जमई जी / मालवी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

अकूम्बे-अकूम्बे म्हारो घर भरियो जी जमई जी
कागद छाया म्हारा मेल
हो जमई आया सासरे
मौजा पेरो तो म्हारा चौक में हो जमई जी
मेंदी निरखी ने मेलां आव
हो रंगीला आया सासरे
जामा पेरो तो म्हारा चौक में हो जमई जी
सोना निरखी ने मेलां आव
हो लिखन्दा आया सासरे
पटका पैरो तो म्हारा चौक में हो जमई जी
दुलमन निरखी ने मेलां आव
हो हंसाकू आया सासरे
कंठी पेरो तो म्हारा चौक में हो जमई जी
चऊँसर निरखी ने मेलां आव
हो रिसाकू आया सासरे
मोती पेरो तो म्हारा चौक में हो जमई जी
लीलम निरखी ने मेलां आव
हो केसरिया आया सासरे
चीरा पेरो तो म्हारा चौमें हो जमई जी
पेचां निरखी ने मेलां आव
हो छबीला आया सासरे
तेजी बैठो तो म्हारा चौक में हो जमई जी
चाबुक निखरी ने मेलां आव
हो रंगीला आया सासरे