भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अक्षर - अक्षर गीत / छाया त्रिपाठी ओझा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बनकर सुर संगीत अधर पर आओ तुम
अक्षर-अक्षर गीतों के बन जाओ तुम

हंसे कामना मौन संग इठलाये भी
और प्रीत का गांव मुझे दिखलाते भी
मधुर राग जीवन की ऐसी गाओ तुम
अक्षर-अक्षर गीतों के बन जाओ तुम

पहन नये परिधान बसंती रंग मिले
फूलों पर भी खूब तुम्हारे रंग खिले
मन उपवन को आकर जरा सजाओ तुम
अक्षर-अक्षर गीतों के बन जाओ तुम

गाती रात सितारों के संग मधुर रागनी
नभ से बसुधा तक फैली है शुभ्र चांदनी
इन किरणों से कुछ पल चलो नहाओ तुम
अक्षर-अक्षर गीतों के बन जाओ तुम

खोना पाना जीवन है तो कैसा डर
पास रहो या फिर मुझसे दूर कहीं पर
खुशबू बनकर अन्तर्मन महकाओ तुम
अक्षर-अक्षर गीतों के बन जाओ तुम

आज नहीं हैं साथ उजाले अब अपने
अंधकार में डूब गये हैं सारे सपने
आकर कुछ खुशियों के दीप जलाओ तुम
अक्षर-अक्षर गीतों के बन जाओ तुम