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अजब महानगरी यह / योगेन्द्र दत्त शर्मा

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भन्ते ! अजब महानगरी यह !

कपिलवस्तु से वैशाली तक
कैसा हाहाकार मचा है
तक्षशिला से नालन्दा तक
केवल यह सम्वाद बचा है
किसने यह षड्यन्त्र रचा है
विकट भयावह हुई परिस्थिति
स्थितियाँ हुईं निरन्तर दुर्वह !

श्रेष्ठिजनों के विरुद-गान में
धूलि-धूसरित होते अन्त्यज
अन्धकार इस ओर सघन, तो
है उस ओर अनोखी सज-धज
विस्मित करता है यह अचरज
आपा-धापी सत्य यहाँ का
कैसा निग्रह, क्या अपरिग्रह !

बोधिवृक्ष के नीचे बैठे
आकुल-व्याकुल मौन तथागत
भिक्षु भ्रमण में हैं भरमाए
श्रमण शिविर में हैं चिन्तनरत
हर दर्शन लगता क्षत-विक्षत
मृगदावों में, चैत्यवनों में
जले सूक्तियों के सब सँग्रह !

व्यक्ति, व्यक्ति के बीच बना जो
कब का टूट चुका है वह पुल
यशोधराओं के इंगित पर
उद्धत हुए तरुण-वय राहुल
त्रस्त हो रहा हंसों का कुल
देवदत्त से हार गया है
हर गौतम का थका अनुग्रह !