भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अज़दहे का बच्चा / नज़ीर अकबराबादी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बेचे हैं अब तो कोई बुलबुल बये का बच्चा।
और बेचता है कोई तोते हरे का बच्चा।
मैना, बया, लटूरा और अबलके़[1] का बच्चा।
तीतर, बटेर, सारस, शकरे, लवे का बच्चा।
सब बेचते हैं आकर, चीते, खरे का बच्चा।
हम बेचते हैं यारो लो अज़दहे का बच्चा॥1॥

खाते थे हमतो इससे आगे पुलाव क़लिया[2]
या रूखी सूखी रोटी या बाजरे का दलिया।
फिरते हैं सर पै रख कर चालीस मन की डलिया।
अब कोई आगरे में ऐसा नहीं है बलिया।
सब बेचते हैं आकर, चीते, खरे का बच्चा।
हम बेचते हैं यारो लो अज़दहे का बच्चा॥2॥

जब बेचते थे यारो, हम अज़दहा पुराना।
सौ-सौ तरह का जब तो आता था हमको खाना।
अब गाहकी जो कम है, तो है यह दिल में ठाना।
एक बच्चा रोज़ लाना, और रोज़ बेच खाना।
सब बेचते हैं आकर, चीते, खरे का बच्चा।
हम बेचते हैं यारो लो अज़दहे का बच्चा॥3॥

गाहक न कोई बोला, है यह बुरा ज़माना।
आज इसको सर पै रखकर सब शहर हमने छाना।
अब भी बिका तो बेहतर नहीं फिर पड़ेगा लाना।
है इससे ही हमारी नित रोटी का ठिकाना।
सब बेचते हैं आकर, चीते, खरे का बच्चा।
हम बेचते हैं यारो लो अज़दहे का बच्चा॥4॥

है डर हम इसको रक्ख, या फेर कर ले जावें।
तो क्या हम आप खावें, और क्या इसे खिलावें।
कुछ बन नहीं है आता, यह दुख किसे सुनावें।
जी चाहता है अब तो यह शहर छोड़ जावें।
सब बेचते हैं आकर, चीते, खरे का बच्चा।
हम बेचते हैं यारो लो अज़दहे का बच्चा॥5॥

सौ मन गेहूं का हर दिन खाने को कहां से आवे।
और सौ पखाल[3] पानी कब तक कोई पिलावे।
जब रात हो तो हर दम, यह ख़ौफ जी में आवे।
शायद इसे चुरा कर, कोई चोर ले न जावे।
सब बेचते हैं आकर, चीते, खरे का बच्चा।
हम बेचते हैं यारो लो अज़दहे का बच्चा॥6॥

रोज़ी के अबतो ऐसे घर-घर में हैं कसाले।
हाथी व घोड़े अपने देते हैं लोग ढाले।
जब तंग होवे रोजी, कौन अज़दहे को पाले।
इसकी भी और हमारी यारो ख़बर खु़दा ले।
सब बेचते हैं आकर, चीते, खरे का बच्चा।
हम बेचते हैं यारो लो अज़दहे का बच्चा॥7॥

नौ दस हज़ार तक तो छूने इसे न देंगे।
इतने रुपे तो इसके एक परके हम न लेंगे।
सत्तर हज़ार तक भी सौदा नहीं करेंगे।
अस्सी हज़ार देगा तो हम भी दे चुकेंगे।
सब बेचते हैं आकर, चीते, खरे का बच्चा।
हम बेचते हैं यारो लो अज़दहे का बच्चा॥8॥

सब उठ गए जहां से वह थे जो लोग जसिया[4]
वह रह गए हैं जिनके घर में नहीं है हंसिया।
इस बात को तो उम्दा हो भोग का बिलसिया।
जो अज़दहे को पाले ऐसा है कौन रसिया।
सब बेचते हैं आकर, चीते, खरे का बच्चा।
हम बेचते हैं यारो लो अज़दहे का बच्चा॥9॥

आगे तो घर बघर थे अक्सर तमामदाता।
सीमुर्ग़[5] पालते थे करने को नाम दाता।
अपने तो कोई हरगिज़ आया न काम दाता।
सच है ”नज़ीर“ आखि़र अजगर के राम दाता।
सब बेचते हैं आकर, चीते, खरे का बच्चा।
हम बेचते हैं यारो लो अज़दहे का बच्चा॥10॥

शब्दार्थ
  1. मैना की जाति का एक काला पक्षी जिसके पर स्याह और पेट सफे़द होता है
  2. कलीय: भुना हुआ गोश्त
  3. पानी भरने की चमड़े की बड़ी मशक़ जिसमें दो हिस्से होते हैं और जिसे भर कर जानवर की पीठ पर डाल कर ले जाते हैं।
  4. खुशनसीब
  5. काफ़ पहाड़ में रहने वाला एक बहुत बड़ा पक्षी