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अति है प्रतिवर्ष इसी से फिर दीपावलि आयी है / गीत गुंजन / रंजना वर्मा

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आती है प्रतिवर्ष इसी से फिर दीपावलि आयी है।
ज्वलन मिलेगी अमिट दीप फिर देने लगा दुहाई है॥

ज्वलन धर्म है ज्वलन कर्म है
ज्वलन लक्ष्य है जीवन का।
इच्छा यही दीप के उर में
परहित त्याग करें तन का।

चंद बिंदु पर उसे मिले तो
क्या जी भर जल पायेगा।
उर की प्याली भर न सकी तो
कैसे प्रभा लुटायेगा।

सिसक रही है दीपावलि मत कहो इसे मुस्काई है।
ज्वलन मिलेगी अमिट दीप फिर देने लगा दुहाई है॥

एक बार जल मरो अरे यह
घिसट घिसट कर जीना क्या।
चिनगारी सिसके वर्षों तक
ऐसा अमृत पीना क्या।

धुँआ करे जो दीप रात भर क्या प्रकाश कर पायेगा।
हो अभाव जीवन जल का भी क्या कर्तव्य निभायेगा।

पल भर क्या मुस्काना जब जीवन भर मिली रुलाई है।
ज्वलन मिलेगी अमिट दीप फिर देने लगा दुहाई है॥