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अध्याय १० / भाग २ / श्रीमदभगवदगीता / मृदुल कीर्ति

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वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥१०- २२॥

इन्द्रिन में मन, देवन में देव,
और सामवेद हूँ वेदन में.
सब प्रानिन में चेतनता हूँ ,
बल ज्ञानन कौ मैं हूँ मन में

रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥१०- २३॥

एकादश रुद्रन में शंकर ,
मैं यक्ष कुबेर हूँ असुरन में,
मैं आठ वसुन माहीं अग्नि,
गिरिराज सुमेरु, सुमेरन में

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥१०- २४॥

में मुख्य पुरोहित देवन कौ,
हे पार्थ! बृहस्पति जानि मोहे.
सागर हूँ सरि- सरितन माहीं.
स्कन्द सेनापति मानि मोहे

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥१०- २५॥

भृगु ऋषि महर्षिन माहीं मैं,
ओंकार हूँ सगरे आखर में.
सब यज्ञन में जप यज्ञ तथा ,
मैं अचल, अचल सब गिरिवर में

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥१०- २६॥

वृक्षन माहीं पीपल विराट,
ऋषि नारद हूँ ऋषियन माहीं.
रथ चित्र हूँ मैं गान्धर्वंन में,
मैं कपिल मुनि मुनियन माहीं

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥१०- २७॥

अश्वन में उच्चश्रवा, गज में,
मैं ही तो एरावत गज हूँ.
मनुजन में राजा एकराट,
मैं दिग्-दिगंत कौ दिग्गज हूँ

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥१०- २८॥

सब गौंअन में हूँ कामधेनु,
और कामदेव हूँ प्रजनन में.
सब सर्पन माहीं सर्प वासुकि,
बल वज्र हूँ सगरे शास्त्रन में

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥१०- २९॥

में शेषनाग सब नागन में ,
और वरुण देव जलधर माहीं.
पितरों में अयर्मा पितरेश्वर ,
यमराज हूँ , राजेश्वर माहीं

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥१०- ३०॥

प्रहलाद हूँ सब दैत्यन माहीं ,
और काल माहीं क्षण,पल मैं हूँ.
मृगराज हूँ सब पशुयन माहीं .
और पक्षिन माहीं गरुण मैं हूँ

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥१०- ३१॥

पावन कर्ता में पवन , शस्त्र
धारण कर्ता में राम हूँ मैं,
मत्स्यन माहीं मैं मगरमच्छ ,
नदियन में गंगा धाम हूँ मैं

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥१०- ३२॥

अति आदि अंत और मध्य सृष्टि ,
कौ आत्म ज्ञान सब ज्ञानिन में.,
बहु वाद विवादन में निर्णय ,
सत युक्ति हूँ सत्य प्रमाणन में

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥१०- ३३॥

सब आखर माहीं मैं अकार,
और द्वंद समास समासन में,
सुन महाकाल कौ मुख विराट
धारक पोषक सब कालन में

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥१०- ३४॥

यश, कीर्ति, क्षमा, श्री, वाक्, धृति,,
स्मृति, मेघा, हूँ नारिन में .
उत्पत्ति विनाशन कौ कारण ,
अथ कर्म माहीं मैं कारन में

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥१०- ३५॥

शुचि गेय श्रुतिन में साम बृहत,
गायत्री छंद हूँ छंदन में,
शुभ माघ कौ मास महीनन में.
ऋतु में बसंत हूँ ऋतुयन में

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥१०- ३६॥

छल छद्म माहीं मैं द्युत करम ,
अति तेजस्वी तेजस्विन में,
जय निश्चय मैं विजिताओं में ,
सात्विक मन सात्विक पुरुषन में

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥१०- ३७॥

कुल यादव में कृष्ण, पाण्डु जन,
माहीं धनंजय अर्जुन हूँ.
कवियों में हूँ कवि शुक्राचार्य ,
मुनियों में वेदव्यास मुनि हूँ

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥१०- ३८॥

बल दंड दमन की शक्ति में,
और चाह विजय नीतिज्ञन में,
अति मौन, गोप के भावन में,
और तत्व कौ ज्ञान हूँ ज्ञानिन में

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥१०- ३९॥

सब प्रानिन के कौन्तेय सुनौ,
सिरजन कौ कारन भी मैं हूँ.
चार-अचर सबहिं कौ मूल हूँ मैं,
यहि सृष्टि कौ कारन मैं हूँ

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥१०- ४०॥

प्रिय मोरे परन्तप मोरी सुनौ,
मोरी दिव्य विभूति कौ अंत कहाँ ?
विस्तार विभूतिन कौ आपुनि,
संक्षेपन तोसों है नैकु कहा

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्॥१०- ४१॥

जेहि-जेहि भी वस्तु विभूतिन मय
बल कान्ति सों युक्त है , मोरी हैं,
मोरे तेज के अंशन जायो सों.
ब्रह्माण्ड की सत्ता मोरी है

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥१०- ४२॥

अथ बहुतहि जाननि सों अर्जुन !
किम, कैसो प्रयोजन होवत है,
एक अंश सों मोरी माया के
जग सगरौ धारण होवत है