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अनन्त क्षितिज / नकुल सिलवाल

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देखे क्षितिज
र ठाने आफुलाई
म त्यँहासम्म फैलिएको छु ,
के माथितिर घुमाए आँखा
आकाश थियो नीलो न नीलो
खसाले आँखा तलतिर
सागर थियो अनन्त…..