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अनुनय है तो जी लूँगा मैं / अमरेन्द्र

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अनुनय है तो जी लूँगा मैं
वरना जीना बहुत कठिन है।

पहले जन्मों में भी मैंने
जीना चाहा था हँस-हँस के
पर हँसने से पहले आँसू
बह निकले थे सब रिस-रिस के
अब भी बीते जन्मों का दुख
गँथा हुआ, ज्यों मन में पिन है।

इक पल हँसना, नौ पल रोना
क्या इच्छा जीने की होगी
मैं माँगूगा फूल अगर तो
तुम भी शायद काँटे दोगी
लेकिन यह भी सह लूँगा मैं
सबका मुझ पर कुछ-कुछ ऋण है।

सुख पर कुछ विश्वास न होता
दुख ही इतना हाथ लगा है
प्रीत-प्रेम सब बैरी-बैरी
चिर विछोह अब बन्घु, सखा है
फिर भी, तुम जब मिले लगा यह
पूस हुआ फागुन का दिन है।