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अन्धकार में, दीप जले तो, रौशन हो / कैलाश झा 'किंकर'

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अन्धकार में, दीप जले तो, रौशन हो।
खुशियों से ही, भरा हमारा, आँगन हो।

सम्मानित कर, ट्रक से उसने, भेज दिया
आयोजक से फिर भी क्यों अपनापन हो।

पग-पग पर नित, हुई परीक्षा, सफल हुए
क्यों न हमारा, सबसे ज्यादा, दुश्मन हो।

मिलने को तो, मिल लेंगे हम, जाकर भी
पर मिलने को, उत्सुक उनका, चितवन हो।

करते हैं हम, यही कामना, ईश्वर से
फागुन जिनका, हो उनका ही, सावन हो।