अपना अहवाल-ए-दिल-ए-ज़ार कहूँ / ग़ालिब

ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाले यार <ref>प्रिय से मिलन </ref>होता
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता

शब्दार्थ
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