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अपनी शरण में लगाइ ला हो सद्गुरु / रघुनन्दन 'राही'

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अपनी शरण में लगाइ ला हो सद्गुरु।
बिगड़ल विमल बनाइ दा बाबा, बिगड़ल विमल बनाइ दा॥टेक॥
जनम-मरन युग-युग सें बाबा, गरभवास दुख भारी डरावा।
जग सें मुक्ति दइ दा बाबा, दुख सें हमरा छुड़ाइ दा॥अपनी.॥
तुम बिन दाता कौन जगत में, मात पिता चाहे भ्राता जगत में।
सबसें ममता हटाइ दा हो बाबा, जीवन सफल बनाइ दा॥अपनी.॥
अरज करइ छाँ तुम्हरो चरण में, शीश धरै छाँ तुम्हरो चरण में।
अपनी ज्योति दिखाइ दा हो सद्गुरु, संसय सकल मिटाइ दा॥अपनी.॥
जग में जितने सब ही लुटेरा, स्वारथ बस सब लोग घनेरा।
‘रघुनन्दन’ स्वरूप दिखाइ दा हो बाबा, दामन अपन धराइ दा।
शब्द में सुरत लगाइ दा॥अपनी.॥