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अब कित जाऊँ जी! हार कर सरणै थाँरे आयो / हनुमानप्रसाद पोद्दार

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अब कित जाऊँ जी! हार कर सरणै थाँरे आयो॥
जबतक धनकी धूम रही घर भायाँ सेती छायो।
साला-साढ्‌ भोत नीसर्‌या, नेड़ो‌इ साख बतायो॥
अणगिणतीका बण्या भायला, प्रेम घणो दरसायो।
एक एकसें बढक़र बोल्यो, एकहिं जीव बतायो॥
सभा-समाज, पंच-पंचायत, ऊँचो भोत बिठायो।
वाह-वाहकी धूम मचा‌ई स्याणो घणो बतायो॥
घरका सभी, साख सबहीसूँ, सबहीकै मन भायो।
बाताँ सेती सभी पसीनै ऊपर खून बुहायो॥
लक्ष्मी माता करी कृपा जद, चंचल रूप दिखायो।
माया ल‌ई समेट, भरमको पड़दो दूर हटायो॥
मात-पितानै खारो लाग्यो, भायाँ मान घटायो।
साला-साढ्‌ सभी बीछड्या, को‌इ न नेड़ो आयो॥
‘एक जीवका’ भोत भायला, एक न आडो आयो।
उलटी हँसी उड़ा‌ई जगमैं, बेवकूफ बतलायो॥
टूट्यो प्रेम, छुट्यो सँग सबसूँ सब को‌ई छिटकायो।
नाक चढ़ाकर मुँहसूँ बोल्या, सब जग हुयो परायो॥
सुखको रूप समझकर जगने, भोत दिनाँ भरमायो।
खुल ग‌ई पोल, रूप सगलाँको असली चौड़ै आयो॥
मिटी भरमना सारी, थाँरै चरणाँ चिा लगायो।
नाथ! अनाथ पतित पापीने तुरत सनाथ बणायो॥