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अब मैं कहा करूँ री माई! / स्वामी सनातनदेव

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राग विलासखानी, ताल झूमर 11.7.1974

अब मैं कहा करूँ री माई।
नंद नँदन की मृदु मुसकन ने बरबस मो मन लियो चुराई॥
देखत ही डार्यौ टोना-सो, हौं तन-मनकी सुधि बिसराई।
मन तो गयो स्याम ही के सँग, तनकों बिरह-व्यथा बिलखाई॥1॥
गयो चैन, नित मैन[1] सतावै, रैन नींदने लई विदाई।
असन-वसन[2] न सुहात सखी री! पावस[3] सी नयनन नित छाई॥2॥
जित देखूँ तित व छवि दीखत, दर-दिवार दरपन जनु माई।
कैसे करूँ काम घर-वर के, मन तो लियो स्याम उरझाई॥3॥
स्याम बिना रहि हों क्यों आली! लालन की लाली उर छाई।
लोक जाय परलोक जाय, पै प्रीतम बिनु जीवन का माई॥4॥
प्राननाथ के भये प्रान तो यहमें कहा भई कोताई[4]
कोउ भलै कहो कुलटा पै मैं तो अब अपनी निधि पाई॥5॥

शब्दार्थ
  1. कामदेव, गोपियों के प्रसंग में प्रेम को ही काम कहा जाता है
  2. भोजन-वस्त्र
  3. वर्षा ऋतु
  4. कमी-कसर