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अरे नवागत! आओ गायें / अवनीश त्रिपाठी

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विदा-अलविदा कहें-कहायें
अरे नवागत! आओ गायें....

फिर कलिंग को जीतें हम सब
फिर से भिक्षुक बुद्ध बनें,
पाटलिपुत्र चलाएँ मिलकर
तथाकथित ही, शुद्ध बनें,
चन्द्रगुप्त-पोरस बन जायें
अरे नवागत! आओ गायें...

मुस्कानों के कुमकुम मल दें
रूखे-सूखे चेहरों पर,
दुविधाओं के जंगल काटें
संशय की तस्वीरों पर
कुहरा छाँटें, धूप उगायें
अरे नवागत! आओ गायें...

खाली बस्तों में किताब रख
तक्षशिला को जीवित कर दें
विश्वभारती उगने दें हम
फिर विवेक आनन्दित कर दें
परमहंस के गीत सुनायें
अरे नवागत! आओ गायें....